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नहीं कभी की मनमानी ,मैं खुद से ही बेगानी थी,
दुनियादारी की बातों से थोड़ी सी अनजानी थी,
थोड़ी सी चंचल थी थोड़ी सी शर्मीली थी,
छोटी-छोटी बातों पर, हो जाती आंखे गीली थी,
एक दिल भी था मेरे अंदर, ना उसको पहचानी थी,
सबकी परवाह करते-करते, मैं खुद से अनजानी थी,
कभी-कभी कागज पर अपने मन की बातें लिखती थी,
कागज मेरा मित्र हो गया, कलम मेरी सहेली है,
प्यार हो गया इन दोनों से, सिरहाने लेकर सोती हूं,
रोज रात को सपने में मैं उनसे बातें करती हूं,
अपने ख्वाबों को मैं साझा, कागज कलम से करती हूं,
संगीता वर्मा✍✍

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