इसी चिरपरिचित पलाश के नीचे,
आज खड़ी होकर उन यादों को जी रही हूँ ।
कभी जो तुम्हारे संग जिया था।
तेरे इंतज़ार में इसने मेरा, बहुत साथ दिया था।
इसके शीतल छांव में, तुम्हारा दो घड़ी को सुस्ताना।
मेरी आगोश में खोकर, अपनी तमाम वेदनाओं को भुलाना।
थोड़ी थकान कम हुई तो मेरे चेहरे को निहारना।
बातों बातों में आक़िबत में ,जीने के ख्वाब देखना।
तुम्हारे स्पर्श का सिहरन आज भी,
रोमांचित कर देता है कभी-कभी।
आज भी याद है वो तुम्हारा ,
मेरे गेसुओं को सहलाना, और कहना....!
इन गेसुओं की छाव में, मेरी उम्र बीत जाए..
हम दोनों के दरमियां कोई, और चीज़ न आए।
लेकिन बीच में आ गई न, तुम्हारी कामयाबी।
उम्र भर साथ चलने की बात करते हुए,
बीच रास्ते में कहां गुम हो गए।
सुना था किसी से ,उँची शख्शियत बन चुके हो।
मुझे अपनी बिरादरी में पैबन्द मान चुके हो।
मैं आज भी आती हूँ इस पलाश के पास ,
जीती हूँ आज भी वो बीत हुआ पल,
अहसास जो कभी तुम संग जिया था।
अपनीे किस्मत पर कभी नाज़ किया था।
तुम्हारे स्पर्श का सिहरन आज भी हरा है।
आँखों के कोरों में कुछ चुभा चुभा सा है।
खड़ी रहती इस नाउम्मीदी के उम्मीद में,
एक कतरा प्यार शायद गिर जाए मेरी झोली में।
मिलन का गवाह ये पलाश ...
आज भी मुझे पहचानता है।
शायद पूछना चाहता है मेरे दिल का हाल.....
कि मै तुम्हारे संग खुश हूं न!
उसे नहीं पता ,अब मैं -तुम साथ नहीँ रहते।
साथ हैं बस तुम्हारी यादों के सैलाब,
जो पलाश के शीतल बयार में उद्धेलित हो गए।
दिल कहता कि कहीं से तुम भी आ जाते तो ......
मेरी तरह इसे भी एक उम्मीद रहती होगी,
अकेला नहीं है वो आज भी।
उसकी छांव में तृप्त प्यार की परछाई,
की कल्पना आज भी पल्लवित है।
आज भी एक आस जिंदा है कि.....
प्रेम हमेशा बिछुड़ने के लिए नहीं होता।
उसकी नियति में कभी कभी मिलना भी होता है।
उसे में कैसे समझाऊँ की प्रेम में मिलन हो जाये ,
ये जरूरी तो नहीं।
तड़प दोनों तरफ हो इसकी कोई मज़बूरी नहीं।
विरह में तड़पना तो प्रेम का सबसे उत्कृष्ट भाव है।
बिछुड़ कर ,प्रिय की याद में जलकर,
आत्मा को खाक कर देना ही प्रेम की परिणति है।
प्रेम की परिणति है।
आक़िबत--भविष्य
स्नेह लता पाण्डेय
नई दिल्ली

2 टिप्पणियाँ