ये कहानी पूर्णतः काल्पनिक है
चिमनी मे आग जल रही थी। बाहर बर्फीला तूफ़ान बारह दिनों से जारी था। जो थमने का नाम नही ले रहा था।
आज उसका जन्मदिन है। बहुत हँसमुख और अच्छा इंसान था। मगर जब तक मै ये सब समझती बहुत देर हो चुकी थी।बात लगभग सात साल पहले की है उस समय होटल का सारा कामकाज पिता जी देखते थे। मगर उनकी तबियत ठीक न होने के कारण उनके काम मे हाथ बंटाने लगी। मगर अनुभव न होने के कारण आए दिन किसी न किसी परेशानी में पड़ जाती थी। उन्ही दिनों की बात है बर्फबारी और आँधी के कारण होटल से बाजार तक के सभी रास्ते बंद हो चुके थे। आठ दिनों से लगातार ऐसा ही मौसम बना हुआ था। और सुधार की कोई उम्मीद नही थी।
होटल में लगभग दो सौ गेस्ट ठहरे हुए थे। और मात्र दो दिन का राशन ही शेष बचा था।मै बहुत परेशान थी। बाजार होटल से लगभग दस किलोमीटर दूर था सारे रास्ते बंद हो चुके थे। अगर राशन लाना है तो पैदल ही जाना पड़ेगा। बहुत सोचने के बाद मैंने खुद जाने का निर्णय लिया मगर ये अकेले संभव नही था। इसलिए मैंने सभी नौकरो को बुलाया और उनसे समस्या बताई। और मदद के लिए कहा। मगर कोई साथ चलने को तैयार नही हुआ।मै निराश होकर होटल के हॉल में बैठ गईं।
कोई इस बर्फीले तूफान का सामना नही करना चाहता था।मुझे समझ नही आ रहा था कि अब क्या करूँ? कैसे होगा ? ये मेरी बेवकूफी का नतीजा था। पिता जी ने पहले ही राशन की पर्याप्त मात्रा मे स्टॉक रखने को कहा था। मगर मैंने उनकी बात को काफी हल्के में लिया। उसी का नतीजा था कि आज इस तरह की परेशानी झेल रही हूँ।
सुबह सभी गेस्ट नास्ते के लिए हॉल में एकित्रत हुए। हॉल में मै भी एक टेबल पर नास्ता कर रही थी। तभी एक गेस्ट ने मेरे पास आकर पूछा। क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?मैंने बैठने का इशारा किया।गेस्ट बोले। मै काफी देर से देख रहा था आप उदास हो। वैसे आप जैसी ख़ूबसूरत लड़की उदास हो तो ये हम जैसे लोगो के लिए डूब मारने की बात होगी। अगर आप को अगर कोई परेशानी हो तो आप मुझ से कह सकती हो।
मै बिना कुछ कहे वहाँ से जाने लगी। तभी वो गेस्ट पीछे से बोले।
गेस्ट ने कहा अगर राशन लेने बाजार चलना हो तो मै तैयार हूँ।
मै उनकी तरफ घूमकर बोली ।आपको कैसे पता?
गेस्ट बोले। जब आप नौकरो से बात कर रही थी तो मै वही पर था। बस आपने इस नाचीज़ पर ध्यान नही दिया।
मै बोली। मगर इतने ख़राब मौसम मै आप क्यों....?
गेस्ट मुस्कुराते हुए बोले भूखे मरने से अच्छा है कि राशन लाया जाए। क्यों सही कहा न?
मुझे ये आदमी कुछ ठीक नही लग रहा था। इसके हावभाव बहुत अजीब थे । मुझे इसके साथ जाने मे डर लग रहा था। मगर राशन लाने जाना जरूरी था इसलिए ये सोचकर की जो होगा देखा जाएगा।मैंने कहा ठीक है एक घंटे में निकलेंगे। कहकर में अपने कमरे मे आ गयी। बाजार जाने सारी तैयारी कर जब बाहर आई तो वो पहले से हि अपने सामान के साथ बैठा था। उसके साथ एक बैग था। जो उसने अपनी पीठ पर टाँग रखा था।मैंने पूछा उस बैग में क्या है? वो मुस्कुराया और बोला कुछ नही न्यूज़ पेपर और कुछ मैगज़ीन टाइमपास के लिए। मैंने सोचा ये टाइमपास कहा करेगा?मगर बिना कुछ पूछे मैं बोली।देखो तूफ़ान थाम गया है। चलो।
वो बोले वैसे मेरा नाम अमित है।
मै कुछ नही बोली । हम लोग चल दिए। हमलोग लगभग चार ही चले होंगे अमित अपने बैग से पेपर निकालकर लाइटर से पेपर को जलाया और अपनी गर्दन सेकने लगा। मुझे बहुत अजीब लगा मैंने पूछा ये क्या कर रहे हो?
अमित हांफते हुए बोला कुछ नही टाइमपास और मुस्कुराने लगा । गर्दन सेंकने के बाद बोला । चलो चलते है कहकर आगे बढ़ने लगा वो आगे आगे चल रहा था और मै पीछे पीछे। तभी अमित ज़ोर से चिल्लाया तूफ़ान आ रहा है। मैंने देखा तूफ़ान बहुत भयानक था।अब हम क्या करेंगे?
अमित इधर उधर देखने लगा तभी अमित बोले उधर देखो शायद वहाँ छुप सकते है। हम आगे बढ़ने लगे आगे एक खंडहर था। हम खंडहर में आ गये अमित ने लकड़िया बटोर कर आग जलाई। खंडहर के बाहर काफी तेज़ हवाए चल रही थी। मगर हम खंडहर मे सुरक्षित थे।
अमित ने थरमस से चाय निकाल कर दी। मै ठण्ड से कांप रही थी।
मै चाय का कप हाथो में लेकर पूछने लगी ।
मैंने- कुछ पूछ सकती हूँ?
अमित :- पूछो।
मै :- तुम अपना गर्दन क्यों सेक रहे थे?
अमित:- मुझे अस्थमा (दमा) है। ज्यादा ठण्ड में गला जाम हो जाता है। सांस लेने में तकलीफ होती है।
मैने:- ।तुम अपने साथ चाय लेकर चलते हो?
अमित :- हा ये मेरा दूसरा और आखरी प्यार है। मैं चाय के बिना एक पल नही रह सकता । इसे तुम लत भी कह सकती हो।
मै :- तो तुम मेरे साथ क्यों आए?जबकि तुम जानते हो की इस सफर मे काफी खतरा है।
अमित :-आप के लिए।
मैने आश्चर्य से पूछा मेरे लिए???
अमित :- हा आप लिए। मै आपको उदास नही देख सकता। मै पिछले तीन महीने से आपके होटल मे रुक हुआ हूँ। आप को क्या कोई भी लड़की यदि उदास हो तो चाहे जितनी भी कठिनाई हो मै खुद को रोक नही पता हु। और मदद के लिए कूद पड़ता हूं।
मै-अपने परिवार के बारे मे बताओ।
अमित- (उदास हो कर) कोई नही है।
मै-कोई तो होगा। तुम कहा से हो? क्या करते हों? अपने बारे में कुछ बताओ।
अमित- क्या बताऊँ अपने बारे में? मै कुछ नही करता। अगर मेरे बारे में जानना चाहती हो तो मैं तुम्हे जरूर बताऊंगा क्योकि पता नही क्यों मगर तुम्हे अपने बारे में बताने का मन कर रहा।मै बी.ए प्रथम वर्ष में पढता था मेरे पापा मम्मी और भाई मेरा परिवार थे। मम्मी पापा के गुजरने के बाद मे अकेला रह गया भाई और भाभी भी अपने परिवार में ब्यस्त रहने लगे। उनको मेरी बिलकुल परवाह नही थी। पर मुझे किसी प्रकार की कमी महसूस नही होती जो चाहता भैया मुझे उपलब्ध करवा देते सिवाय समय के।कॉलेज में ही मेरी मुलाकात नैना से हो गयी। पहले बातो से सुरुआत हुई । फिर धीरे धीरे हम मे प्यार हो गया। हम शादी करना चाहते थे। जब मैने भैया को ये बात बताई तो वो बहुत खुश हुए और नैना के पिता से बात करने को तैयार हो गये।मगर भाभी को ये बात अच्छी नही लगी वो मेरी शादी नही करना चाहती थी। भाभी मुझे पसंद नही करती थी। उन्होंने मुझपर छेड़ छाड़ का आरोप लगा दिया। इस आरोप को सच मानकर नैना ने मुझे छोड़ दिया। मुझे जेल हो गयी। मगर भैया को मुझ पर पूरा भरोसा था। वो भाभी को घसीट कर थाने लाए और FIR वापस लेने को कहा । मै जेल से बाहर आ गया। मै भैया और भाभी घर आ गये। भैया भाभी को कमरे मे ले गए और भाभी को बहुत मारा । भाभी रात चीखती चिल्लाती रही। मुझे बहुत बुरा लग रहा था। मै इन सब के लिए खुद को दोषी मान रहा था। सुबह भाभी मेरे कमरे मे आई और आकार मेरे पैर पकड़ लिए और रोते हुए माफ़ी मांगने लगी और कहा कि तुम ये घर छोड़कर चले जाओ नही तो मैं आत्महत्या कर लुंगी। अगर तुम घर छोड़ कर चले जाओगे तो मै वादा करती हूँ की तुम्हारा जो भी खर्चा होगा तुम्हारे खाते में भेजती रहूँगी।जितना तुम चाहो । मगर अब इस घर मे मै तुम्हारे साथ नही रह सकती।भाभी वहाँ से चली गयी। मगर मेरा मन अशांत हो गया। मै सोचने लगा। नैना ने मुझे छोड़ दिया। दोस्त भी इस घटना के बाद मुझ से दूर हो गये। अब मेरे लिए यहाँ कुछ नही बचा है। मेरा यहाँ से चला जाना ही बेहतर होगा।मैने घर छोड़ दिया। भाभी ने अपना वादा निभाया ।आज भी भाभी मेरे खाते में हर महीने पर्याप्त पैसे भेज देती है। उस समय मेरी उम्र मात्र 19 साल थी मै इसी तरह अलग अलग सहरो में होटलो में घूम कर जीवन बिता रहा हूँ। बंजारे जैसा जीवन जी रहा हूँ। न किसी से कोई अपेक्षा न उम्मीद ।इतना कहकर अमित मुस्कुराने लगा और बोला ।
अमित:- बाते ही होंगी या बाजार भी चलना है? तूफान थम गया है। चलो भी।हम काफी चलने के बाद बाजार पहुच गए। राशन का सामान खरीदते खरीदते शाम हो गई।
मै :- आज रात यही रुक जाते है। कल सुबह चलेंगे।
मगर अमित को ये बात अच्छी नही लगी।
अमित- अगर रुकेंगे तो कल सुबह समय पर नही पहुँच
पाएँगे। इसलिए आज ही चलते तो अच्छा रहता।
मै- मगर होटल तक पहुचते पहुचते रात हो जाएगी। और सारा रास्ता भी बर्फ से ढका हुआ है। हम लोग मुसीबत में पड़ सकते है। इसलिए सुबह चलना ही ठीक होगा।
अमित- अगर हम सुबह तक नही पहुचे तो सुबह का नाश्ता होटल में नही बन पाएगा ये तुम भी जानती हो। तुम्हारे होटल की बदनामी होगी। अगर अँधेरा ज्यादा हो गया तो वो खंडहर याद है न। वही रुक जाएंगे। मैंने जलाने का सामान भी ले लिया है।
मै-मतलब तुम पूरी तैयारी कर चुके हों उस खंडहर में रुकने की?(अमित कुछ नही बोला सिर्फ मुस्कुरा दिया)
मै न चाहते हुए भी उसके साथ जाने को मजबूर हो गयी।हम होटल के राशन का सामान एक छोटी सी स्लेज पर रख कर निकलने के लिए तैयार हो गए। मगर अमित पता नही कहा चला गया।मै इधर उधर देखने लगी। अमित दिख गया वो अपने थरमस में चाय भरवा रहा था। चाय का थरमस बैग में रखते हुए वो मेरी तरफ बढ़ा और मुझसे चलने के लिए बोला।हम पहाड़ी रास्तो से सम्भलते हुए आगे बढ़ने लगे। कुछ चलने के बाद ही मौसम खराब होने लगा ठण्ड भी बढ़ने लगी। मुझे अमित पर बहुत गुस्सा आ रहा था। थकान और ठण्ड के कारण मेरे पैर जवाब देने लगे। अँधेरा भी बढ़ता जा रहा था।तभी अमित बोला जल्दी चलो नही तो देर हो जाएगी।ये सुनते ही मेरा गुस्सा सातवे आसमान पर चला गया। मेरा धैर्य जवाब दे गया।मै गुस्से से बोली।
मैं:- (गुस्से से) तुम अपने आप को समझते क्या हो? जब तुम से कहा कि बाजार में ही किसी होटल में रुक जाते है तो तुमने मना कर दिया| अब बताओ हमारी हालात धोबी के कुत्ते जैसी हो गई। अभी भी तुम्हारी घटिया खंडहर बहुत दूर है। वहाँ तक पहुचने मे अँधेरा तो हो ही जाएगा।
अमित मुझे सिर्फ देख रहा था मगर कुछ बोला नही। और मै गुस्से से बोलती जा रही थी। कुछ देर मुझे सुनने के बाद।
अमित :-अगर हम सुबह नही पहुँचे तो होटल के गेस्ट को नास्ता नही मील पाएगा।
तभी मै ऐसी बात बोल गयी जो मुझे नही बोलनी चाहिए थी। जिसके लिए मे आज भी पछता रही हू।मैंने कहा कि गेस्ट को सुबह का नास्ता नही मिलेगा तो वो मर नही जाएंगे । और तुम इतनी रूचि क्यों ले रहे हो ये होटल न तुम्हारा है और नाही तुम्हारे बाप का। ये होटल मेरा है। और मै जैसे चाहू वैसे चलाऊंगी । तुम मालिक नही हो।
अमित- (मेरे कन्धे पर हाथ रखते हुए बोला)खंडहर आ गया चलो आज रात यही रुक जाते है। कल सुबह यहाँ से चला जाएगा।
मै अपने कन्धे से अमित का हाथ झटक कर। खंडहर की तरफ गुस्से मे आगे आगे चलने लगी।अचानक मुझे ठोकर लगी और मै गिर गयी। मेरा पैर टूट चुका था। मै दर्द से कराहने लगी। मैं उठ नही पा रही थी। मेरे मना करने और नाराज़ होने के बावजूद अमित मुझे अपनी बाहों में उठा कर खंडहर में ले आया।
अमित ने मुझे एक जगह बैठा कर लकड़ी को जलाने लगा। आग को जलाने के प्रयास करते हुए उसकी जेब से इन्हेलर गिर गया जिसे मैंने चुपके से उठाकर छुपा लिया।जब मै कुछ शांत हुई तो अमित मुझे चाय देने लगा । मैंने चाय का कप हाथ में लिया और चाय पीने लगी। अमित भी मेरे पास ही बैठ गया। और बोला ।
अमित:-तुम्हारा गुस्सा जायज़ था । मैं सही में कुछ ज्यादा ही दखल देने लगा था। मगर एक बार मेरी नज़र से सोच कर देखो । माना कि गेस्ट एक सुबह नाश्ते के बिना रह सकते है मगर बच्चो का क्या? उन्हें तो हम भूखा नही रख सकते। मैं तुम्हारे होटल मे सिर्फ गेस्ट हु और कुछ नही। अगर तुम्हे मुझसे शिकायत है तो मै खुद होटल छोड़कर चला जाऊंगा मगर तुम्हे सही सलामत पहुचा दूँ। उसके बाद चला जाऊँगा।अमित सोने के लिए दूसरी तरफ चला गया।मै फिर गुस्से से भर गयी। मै सोचने लगी। खुद को बहुत तेज़ समझता है। इसी के कारण मेरा पैर टुटा अगर ये मुझे गुस्सा न दिलाता तो आज मेरा पैर सही सलामत होता। और मुझे सही सलामत पहुचाने की बात कर रहा है इसे तो मैं सबक सीखकर रहूँगी।मैंने बिना कुछ सोच विचार किये अमित का इनहीलर आग मे फेक दिया। इसके बाद । अमित के बैग से सारा न्यूज़ पेपर निकाल कर छिपा दिया। और सो गई।सुबह मुझे कुछ हलचल महसूस हुई। मैंने देखा की मैं कम्बल में ढकी हुए स्लेज पर थी। मैंने कम्बल से बाहर झाँककर देखा तो अमित हाँफता हुआ स्लेज खींच रहा था। हम होटल के करीब पहुचे होटल की खिड़किया और होटल के अन्दर के लोग मुझे साफ़ दिखायी दे रहे थे । तभी अमित की साँसे उखड गई। वो बैचैन होकर अपना इन्हेलर खोजने लगा। उसकी हालत देखकर मै आत्म ग्लानि से भर गई। ये मैंने क्या किया? अब अमित अपनी बैग से पेपर निकलने की कोसिस करने लगा मगर पेपर बैग में था ही नही। अमित जोर जोर से साँसे लेने लगा। अमित जोर से चिल्लाया और जमीन पर गिर कर तड़पने लगा। मै होटल की तरफ देखकर चिल्लाकर हाथ जोर जोर से हिलाने लगी जिससे कोई हमारी तरफ देखे और मदद करे । मगर किसी ने हमारी आवाज नही सूनी । मै काफी देर तक रोती चिल्लाती रही। कुछ समय बाद एक नौकर की नज़र हम पर पड़ी। वो हमारी तरफ दौड़ा उसके पीछे होटल के गेस्ट भी आने लगे। सभी हमे होटल के अन्दर आए।हमारे गेस्ट में एक डॉक्टर भी थे जिन्होने अमित की जाँच की। डॉक्टर साहब की बात सुनकर सभी मायूस हो गए। मुझे तो मानो साँप सूंघ गया। मेरी एक गलती के कारण अमित अब इस दुनिया से जा चूका था। मेरा गुस्सा अमित की जान ले चुका था। अमित का तड़पना मुझे बार बार याद आ रहा था। मगर मैं अब सिर्फ रोए जा रही थी। उसकी सारी बाते याद आ रही थी । उसका मासूम चेहरा। मगर अब सब खत्म हो चूका था। अमित की लाश मेरे सामने थी । और मै बेबस उसकी लाश के पास बैठी थी। बस उसे ही देखे जा रही थी।
प्रशान्त कुमार पाठक

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