⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘
धरा असंख्य बोझ से दबती रही---
दिन,प्रतिदिन,महीनों,साल---
बढ़ती रही आबादिया---
सहती रही भार को----
देखो उसे,अफसोस भी करती नहीं---
सहनशीलता की मूर्ति बनी सदा---
सूर्य की तपिश से जलती रही,
बादलों से गिरी एक बूंद पानी की---
मिला जरा सुकून उस धरा को,
देखकर धरा की विरानी को--- 
बादल मुंह मोड़ कर चले गए,
तपिश से जलती रही धारा,
आसमान को एकटक तकती रही,
थी कभी हरियाली से सुसज्जित धरा,
कभी था उसका भी अस्तित्व हरा भरा,
  बना दी है अब धरा की ऐसी दुर्दशा---
बना दिए हैं भवन और इमारतें,
छीन के धरा की सारी राहतें,
फिर भी असंख्य बोझ से दबती रही,
देखो धरा अफसोस भी करती नहीं,
सहनशीलता की मूर्ति बनी सदा,
सूर्य की तपिश से जलती रही।



   संगीता वर्मा✍✍