साल दर साल
गुजरते ये साल
चुरा कर चल देते हैं
लुनाइयाँ चेहरे से,
अल्हड़पन मुस्कानों से,
कौतुहल आँखों से,
उन गुजरे सालों को
मुट्ठी में जकड़ने की
बचकानी कोशिशें करता
ये पागल मन!
हथेलियों में सँजोई
नेमतों को सहेजते,
सहारे तलाशती
तन की अक्षमताओं
से आशंकित,
हर तर्क से परे
स्वीकारता है अब
उस ईश्वर की सत्ता को
जिसके चरणों पर
हर भय को रख,
निश्चिंत हो सके
ये स्वार्थी मन!
श्रुत कीर्ति अग्रवाल

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