# 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की अगली कड़ी में आज हम बात करेंगे के द्रौपदी की
पंचकन्या में एक द्रौपदी
महाभारत काल में द्रुपद ने द्रोणाचार्य से प्रतिशोध लेने के लिए जब यज्ञ किया था तो उसे पुत्र के रूप में 'धृष्टधुम्न' और पुत्री के रूप में 'कृष्णा' की प्राप्ति हुई थी।
जी हां, द्रौपदी का नाम जन्म के समय कृष्णा रखा गया था। पांचाल की राजकुमारी होने के कारण 'पांचाली' तथा द्रुपद की बेटी होने के कारण 'द्रौपदी' कहलाई।
पांच पति होने का कारण:
द्रौपदी पूर्व जन्म में किसी ऋषि की कन्या थी उसने पति पाने की कामना से तपस्या की। शंकर भगवान ने प्रसन्न होकर वर देने की इच्छा की। द्रौपदी ने सर्व गुण संपन्न पति मांगे और पांच बार कहां, शंकर भगवान ने वर दिया अगले जन्म में पांच पति होंगे क्योंकि आपने यह कामना पांच बार दोहरायी है।
दूसरा कारणः
द्रुपद को जब पांचों पांडवों से द्रौपदी के विवाह का कारण व्यास मुनि ने बताया और दिव्य दृष्टि देकर दिखाया भी
एक बार 'रूद्र' ने पांचों इंद्रो को उनके अभिमान स्वरूप यह श्राप दिया था कि वह मानव रूप धारण करेंगे उनके पिता क्रमश धर्म, वायु, इंद्र तथा अश्वनी कुमार(द्वय) होंगे और पृथ्वी पर उनका विवाह मानवीय रूप में इंद्राणी से होगा।
स्वामी इंद्राणी द्रौपदी के रूप में प्रकट हुई।
पांचों के साथ कैसे रहीः
सबसे पहले द्रौपदी और युधिष्ठिर एक साल तक साथ रहे और उनके पुत्र का नाम प्रतिविंध्य था।
फिर उन दोनों ने 1 साल तक तपस्या की ताकि वे अपनी स्मृतियां भुला दे
तथा इसके पश्चात इसी तरह से सभी ने एक-एक तपस्या करते हुए क्रमशः पांच पुत्रों का परिवार बनाया
भीमसेन से द्रौपदी को सुतसोम नाम का पुत्र
अर्जुन से श्रुत्कीर्ति
नकुल से शैतानी और सहदेव से श्रुत वर्मा नामक पुत्र थे।
मेरी नजर में समीक्षाः
द्रौपदी एक राजा की पुत्री जिसने उस समय पांडवों से विवाह किया था तब वह लाक्षागृह की घटना के पश्चात वन में छिपे हुए थे। कोई राजा महाराजा नहीं थे।
पिता ने स्वयंवर रखा और जिसने उस शर्त को पूरा किया द्रौपदी ने उससे ही विवाह स्वीकार किया।
माता कुंती का वचन सत्य करने के लिए उसने पांचों पांडवों में बटना स्वीकार किया।
विवाह के पश्चात जब पहले दिन पांचों भाई भिक्षा मांग कर लाए तो माता कुंती ने द्रोपती को कहा- "पुत्री, मेरे पुत्र
जो भी भिक्षा मांग कर लाए तो उसमे पहले देवताओं का अशं निकालो फिर ब्राह्मणों को भिक्षा दो तत्पश्चात आश्रितों का अंश निकालकर, जो बचता उसका आधा भाग भीम का तथा आधे में वह सब भोजन परोसो"।
देवी द्रोपती ने कुंती के आदेश का पालन किया और भोजन के पश्चात स्वयं माता कुंती के पैरों में सो गई
संघर्षः
द्रोपती राजकन्या होते हुए हस्तिनापुर की महारानी होते हुए भी जीवन के अधिकतर समय में अपने पांचों पतियों के साथ वन में रही।
कभी अर्जुन के चले जाने पर उसने सालों तक एक समय भोजन किया।
हस्तिनापुर की राज्यसभा में द्रोपती का इतना बड़ा अपमान हुआ।
'यज्ञसेनी' होते हुए, समर्थ होते हुए उसने किसी को श्राप नहीं दिया।
क्षमा की देवीः
अश्वत्थामा ने जब द्रौपदी के पांचों पुत्रों का मार दिया और उसके पश्चात जब उसे द्रौपदी के सामने लाया गया तो श्री कृष्ण भगवान ने कहा अंतिम फैसला सखी तुम लो और उसने अश्वथामा को क्षमा कर दिया।
सीख द्रौपदी के चरित्र से
पूरे महाभारत में हम देखते हैं द्रौपदी ने एक अच्छी बेटी, एक अच्छी बहु तथा एक अच्छी पत्नी और एक अच्छी मां होने का प्रत्येक कर्तव्य निभाया
श्री कृष्ण की भक्ति की तो उस चरम सीमा तक एक आवाज पर भगवान चले आते थे।
'शची' का रूप द्रौपदी ना सुंदरता में कम थी, ना सामर्थ्य में, ना शक्ति में
फिर भी वह सब कुछ सहती है क्षमा करती हैं।
हर विपदा में अपने परिवार का साथ देती हैं।
किंतु विडंबना देखिए समाज आज उसी देवी, तपस्विनी पतिव्रता द्रौपदी के नाम को कुछ विधर्मी व्यंग्य और मजाक में इस तरह से लेते हैं...
द्रोपती के जीवन से क्षमा करना संघर्ष करना सीखना चाहिए सभी महिलाओं को
और जो कोई भी आगे से द्रौपदी के चरित्र के बारे में या कोई भी बात करें तो मैं आशा करती हूंँ कि आप उसका जवाब देंगे ।धन्यवाद!
#अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं
वंदना शर्मा🙏

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