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मित्रता का मतलब ही है कि
हम खुद से ज़्यादा उन्हें मानते हैं
जिन्हे हम दिल से चाहते हैं,
जिनसे ये रिश्ता बाँधा है
यानी ''दोस्ती'' का,....
ये रिश्ता सिर्फ़ और सिर्फ़
पावन होता है।
इन रिश्तों का बाज़ार नहीं होता
ना ही इनका व्यपार होता है।
ये नहीं बिकते थोक या फुटकर में
इन्हे तो ख़रीदा जाता है,बस
''निश्छल मन से''
इन्हे बाँधा जाता है केवल
'भरोसे की डोर से''
दोस्ती भरोसे की जागीर होती है
दोस्ती 'बिश्वास ' की नींव पर
टिकी होती है,
तभी तो ये दौलत अनमोल होता है
जिस रिश्ते को हम
चाह कर भी न भूल नहीं पाते है
ना ही किसी मोड़ पर आज़माते हैं,....
वही यह पावन पवित्र दोस्ती होता है!!
जिन्हे हम उम्र भर
बिना शर्त निभाते है!!
@ मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी उत्तर प्रदेश

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