मेरे घर पर ठीक सामने एक सुंदर उपवन है। जिसकी नम माटी में ,
लगे हैं, सैकड़ों पेड।़ तरह-तरह के पुष्पों के, फागुनी बयार से ,
लताएं झूम झूम कर गा रही हैं ।
कलियां शर्मा रही हैं।
मंजर मंजर फूलों से लदी डालियाँ,
आपस में बतिया रही हैं। झूम झूम भ्रमर कलियों पर ,
पुष्पों पर मंडरा रहे हैं। अपनी गुनगुन बीन बजा उन्हें रिहा रहे हैं।
फिर संग संग सभी,
प्रेम की बंसी बजा रहे हैं। मैं इस मादक वसंत में भी,
उन्हें प्यासे नैनो से, निहार रहा हूं ।
उनसे इर्षित अपनी किस्मत पर ,
खार खा रहा हूं ।
आह! मैं विधाता की, कौन सी भूल हूं ।
मैं एक शापित यक्ष नहीं, गमले का फूल हूं।
स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय
गोरखपुर

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