अष्टकमल दल मूलाधार मे"
विराज,है,त्रिशक्त्तियाँ"""""
उन्मुकत हो ,वो बढ चली"
उर्जा,रुप मे ,विभक्तियाँ"""""
परणित हो उर्जा रुप मे,
पंचतत्व ,मे वो बह रही"""
शुद्ध कर, अशुद्ध को ,ह्रदय"
द्बार के,किवाड मे"
बढ चली भावहीन हो ""
मस्तिष्क के,प्रवाह मे""""
उर्जा शक्ति रूक गई"""
मन के उस भटकाव मे """
मन मंथन कर रहा"
फस रहा है ,मोह मे"
है ,कही,स्थिर नही,
भागता, निर्भाव मे"
ज्ञान से अज्ञान का ""
रास्ता" फिर मिला""""
कर लिया,वश मे उसे"
न रहा,अब मोह मे""""
मंथन ,के भाव को"
जड से ही निगल गई"""
केन्द्र,बिन्दु को लाघकर"
उर्जा शक्ति न रुकी "
नीला सा प्रकाश वो"
असमाँ से जा मिला"
सृष्टि,फिर मुखरित हुई"
मन बडा हल्का हुआ""
लक्ष्य फिर सरल हुआ"
मन ,के उस विचार को""
फिर नया रास्ता मिला"
कर्मपथ सरल हुआ,अब "
मन ,नही ,अटकाव मे""
मंजिले हासिल हुई"
अब नहीँ,,भटकाव मे""""
रीमामहेन्द्र ठाकुर

1 टिप्पणियाँ