प्यारा-सा जो ख्वाब था
अधूरा -सा रह गया ।
मंजिल भी जो पास था
कदम चलते-से रुक गया ।।
उस मुकाम के पास थी
मैं सोचती -सी रह गयी ।
चिराग तो नजर आया था
सूरज ढलता-सा रह गया ।।
नई सुबह ,नई मंजिल थी
एहसास करती-सी रह गई ।
प्यारा -सा जो ख्वाब था
हकीकत में बयां हो गया ।।
मनीषा भुआर्य ठाकुर
कर्नाटक

1 टिप्पणियाँ