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जीवन के हसीन पलों की यादों को दोहराते हैं,
आओ सभी अपनी-अपनी बीती, यादों में खो जाते हैं,
वह दिन भी क्या दिन होते थे, सपनों में खोए रहते थे,
एक अल्हड़ उम्र थी अपनी, मंत्र प्रीत के गाते थे,
प्रेम की धुन में लीन हमेशा---
ना जगते ना सो पाते थे,
एक मूरत से बन जाते थे,
स्वर्ण सुहाना मौसम लगता,
हर कली फूल की गाती थी,
भंवरे गुंजन करते रहते---
बारिश की बूंदे भी, संगीत सुनाती थी,
फूलों की खुशबू से महकता---
क्या, आलम सुहाना लगता था,
हवा के झोंके तन को जब, छूकर गुजर जाते थे,
दुनियादारी से परे, एक दुनिया अपनी होती थी,
मूंदकर नैनो को सपनों में चांदनी रात में सोते थे,
जीवन के हसीन पलों की यादों को बोते थे,
वो दिन भी क्या दिन होते थे, सपनों में खोए रहते थे,
संगीता वर्मा✍✍

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