बाय शिल्पा .....
हंसती खिलखिलाती रीमा घर में घुसी तो सामने सोफे पर रूद्र को ढीले ढाले अंदाज में बैठे देखकर हिचक गई।
" अरे आप जल्दी आ गए मैं जरा शिल्पा के साथ शॉपिंग पर गई थी " , रीमा रुक रुक कर बोली ।
उसे याद आ गया था कि पिछली बार ऐसी बात पर रुद्र उलझ गया था ।
" तुम तो इस बड़े शहर के रंग में बहुत जल्दी रंग गई मैंने ऐसा नहीं सोचा था । आयुष को भी अकेला छोड़कर सैर सपाटे पर निकल जाती हो " , रुद्र की आवाज में आक्रोश के साथ चेतावनी महसूस हो रही थी।
" अरे लो मैं फ्राइड राइस लाई हूं पैक करा कर चलो खाते हैं और आयुष अकेला कहां था यहां 4 लोगों का कॉमन फ्लैट है । नाराज मत हो अब मैं ऐसा नहीं करूंगी ।"
रीमा जल्दी बात मान मनौव्वल पर खत्म कर देना चाह रही थी।
सो बात आई गई हो गई ।
यह बात नहीं थी कि रीमा संस्कारी और समझदार नहीं थी लेकिन जब से शहर के पॉश इलाके की बड़ी बिल्डिंग में शिफ्ट हुई थी अपने मिलनसार प्रकृति के कारण ढेरों दोस्त बना लीं थीं अब शुरू हो गई रोज रोज पार्टी क्लब , किटी और तफरीह ।
शुरू शुरू में उसे बहुत मजा आ रहा था । फ्रेंड्स उसकी ड्रेसिंग सेंस की तारीफ , घरेलू रखरखाव की तारीफ करती तो उसका सर फ़ख़्र से ऊंचा हो जाता । वह पढ़ी-लिखी तो थी मगर छोटे शहर से आई थी जहां यह सब चलन नहीं था फिर हंसी मजाक तो किस औरत को पसंद नहीं ।
घर में कोई समझाने वाला या टोकने वाला बड़ा भी नहीं था सिर्फ रूद्र जो ऑफिस चला जाता आयुष स्कूल के बाद नाइंथ क्लास की कोचिंग चला जाता । सारे दिन घर में अकेली बोर भी होती और दूसरी महिलाओं द्वारा घसीटी जाती ।
पहली बार रूद्र ने उसे बड़े प्यार से समझाया क्योंकि वह जानता था रीमा किसी के बहकावे में आकर घर गृहस्थी से ग़ाफिल होने वालों में से नहीं थी मगर बड़े जगह की चमक ही ऐसी होती है जिससे सब की आंखें मिचमिचा जाती हैं।
सुबह हुई रूद्र ऑफिस गया तो सेकंड फ्लोर वाली मनीषा फिर उतर आई और शाम में होने वाले क्लब में चलने के लिए दावत देने लगी सब कुछ भूल के रीमा अपने कपड़ों की अलमारी से ड्रेस सेलेक्ट करने लगी लेकिन कोई भी नया ड्रेस ढूंढ ना सकी , सारे ही तो सब ने देख लिए हैं । क्या पहनूं ? शाम को क्लब है तो अगर नया ड्रेस लेने जाना है तो अभी जाना होगा । खाना भी नहीं बना है और रुद्र की कोचिंग में टेस्ट है मैं ना रहूंगी तो पढ़ाई में ध्यान नहीं लगाएगा ।
पिछले टेस्ट में भी कम नंबर आए थे तब रूद्र मुझे ही समझाने बैठ गए ।
यह सब सोच के रीमा गुस्से से खिसिया गई । क्या मेरी लाइफ नहीं है । मुझे भी एंजॉय करने का हक़ है।
लेकिन पैसा भी तो खत्म हो गया मेरे पास पिछले हफ्ते किटी पार्टी के लिए ड्रेस लाई थी । यहां तो सभी हमेशा नए कपड़े पहनती हैं । इतनी तो अमीर हैं सब ।
रीमा ने सोचा ।
" अमीर नहीं हैं वो लोग सिर्फ अपने पति का दिमाग खाती हैं या फिर बेपरवाही से पैसा उड़ आती हैं।"
रुद्र का दिया गया तर्क उसे याद आ गया ।
क्या करूं? क्या ना करूं ? मनीषा को आयुष के टेस्ट के बहाने से मना कर देती हूं जाकर अभी ।
" अरे यार तुम मना क्यूं कर रही हो ? आयुष बड़ा हो गया है। मेरे भी तो दो बच्चे हैं तब भी मैं जाती हूं हर फंक्शन में । अभी तुम नई हो मैं तुम्हें सब मैनेज करना सिखा दूंगी ।" ,
मनिषा ने चालाकी से कहा।
" देखो जितने ज्यादा लोग होंगे उतनी हंसी मजाक होगी मैं और मेरे फ्रेंड तो हर नई आने वाली महिला को अपने ग्रुप में शामिल कर लेते हैं बताओ तुम्हें भी तो अच्छा लगता है ना ! इस बार तो ड्रिंक का भी इंतजाम किया है " , मनीषा जरा जोर से बोली ।
रीमा तो आवाक रह गई ...
हां मुझे भी एंजॉय करना पसंद है ।
सारी बात अब धीरे-धीरे उसके समझ में आने लगी । इस बार आयुष का बहाना बना दिया अब आगे की बाद में सोचूंगी ।
इन्हीं सोचों में गुम धीरे ...धीरे... सीढ़ी उतर रही थी । कि तीसरी मंजिल पर रहने वाली मेहता आंटी मिल गई । जो रीमा को बहुत अच्छी लगती थी । आंटी की उम्र ज्यादा तो नहीं थी लेकिन दूसरी महिलाएं उनसे काफी छोटी थी सो उन्हें आंटी बुलाती थी ।
"चलिए आंटी चाय पिलाती हूं " रीमा ने मैनर्स के नाते कहा।
" तुम कई बार कह चुकी हो मैं नहीं आ पाती तो आज मैं थोड़ा फ्री हूं चलो चलते हैं " मेहता आंटी बोली ।
मेहता आंटी से उसकी पहली मुलाकात क्लब में ही हुई थी । फिर कभी कुछ बनाती तो उनके घर ले जाती वह खुश हो जाती । आंटी अपाहिज बच्चों का एक NGO चलातीं है । अकेले ही आंटी अंकल यहां रहते हैं बच्ची तो बैंगलोर में पढ़ाई कर रही है ।
" आंटी बैठिए मैं कॉफी बना कर पिलाती हूं " रीमा बोली ।
" नहीं ग्रीन टी बनाकर लाना " , भारती आंटी हंसते हुए बोली । हा हा हा... हम भी तो फैशनेबल हैं ।
दोनों हंसने लगी ।
क्या हुआ ? रीमा तुम मुझे कुछ उलझी हुई लग रही हो चाय वाय छोड़ो यहीं बैठो । कहीं गई थी तुम ? किसी से मिलने ?
रीमा कुछ सोचते हुए पहले झिझकी कि इनसे बताऊं या नहीं । आंटी का स्वभाव इतना मधुर था कि आखिर उनसे राय लेने के लिए बता ही दिया ।
" वह आज लेडीज क्लब है ना उसी के लिए मनीषा को मना करने गई थी ।"
" वाह आज फिर पंचायत सजनी है " आंटी हंसने लगी ।
मैं यहां से पहले मुंबई में रहती थी बहुत पार्टी फंक्शन फंक्शन अटैंड करती थी । तब मेरी सास इस पार्टी को पंचायत कहती थीं ।
" बस पंचायत लगती है ना कोई फैसला ना कोई मसले का हल "
मेरी सास कभी मना तो नहीं करती थीं मुझे लेकिन सिर्फ इशारों में समझाने की कोशिश करती थीं। मैं आज आज भी उनका धन्यवाद करती हूं कि उन्होंने मुझ पर जोर जबरदस्ती ना कर बल्कि स्वयं से समझने के लिए वक्त दिया । और वक्त ही सबसे अच्छी शिक्षा देने वाला होता है । समय पर हम सब सीख जाते हैं और यही सही भी है । समय रहते चेत जाओ वरना तो फिर पछताना ही है ।
आंटी आप तो मुझे डरा रही हैं और पंचायत नाम से तो मुझे हंसी भी आ रही है । मुझे तो इन फंक्शन में बहुत मजा आता है । तारीफ भी सुनने को मिलती है ,टाइम पास हो जाता है "
रीमा ने जवाब दिया ।
" हां यह सही है मैं तो अभी भी जाती हूं मुझे अभी भी अच्छा लगता है मगर किसी चीज को अपने ऊपर कितना हावी होने देना है। फैसला दूसरों के मशवरे से नहीं अपने विवेक से लेने होते हैं । दूसरे क्या कर रहे हैं ? कैसे ? कहां ? कितना पैसा खर्च कर रहे हैं ? यह उनका निजी मामला है। इस तरह की करी हुई दोस्तिंयां अपना कोई महत्व नहीं रखती ।"
चलो छोड़ो मैं भी कहां ! तुम तो खुद ही समझदार हो ।
मेहता आंटी बात खत्म करना चाह रही थी ।
" नहीं नहीं आप बड़ी हैं। बताइए आपने कैसे खुद को संभाला " रीमा ने उत्सुकतावश पूछा ।
" बेटा मैं एडवाइस देने में तो बिलीव नहीं करती क्योंकि हर व्यक्ति मेरी नजर में समझदार है । सिर्फ अपनी छोटी सी कहानी बता देती हूं तुम समझ लेना ।
तुम्हारे अंकल का कारों का बड़ा बिजनेस था पैसे की कोई कमी नहीं थी अंकल अक्सर बाहर जाते थे घर पर मैं सास और मेरी बेटी रहते थे । मैं फ्रेंड्स के साथ घूमने में व्यस्त हो जाती । दो ऐसी बातें हुई जिनसे मुझे एहसास हुआ कि हर चीज की सीमा होती है ।
पहली यह कि मेरी जितनी भी दोस्ती थी वह मेरे 1 महीने तक टाइफाइड हो जाने पर दिखावे के लिए भी पूछने नहीं आई । यह तो कोई बड़ी बात नहीं मगर..
दूसरे हादसे ने मेरी आंखें खोल दी घर में मैंने मेल सर्वेंट रखा था खाना बनाने के लिए और घर की दूसरी चीजों को लाने के लिए । घर में अधिकतर समय मेरी अनुपस्थिति से फायदा उठा कर उसने कई बार चोरी की और दूसरी बार मेरी नन्ही बच्ची के साथ एक बुरा हादसा पेश आते आते बच गया यदि मेरी सास उस वक्त उस आदमी से हिम्मत करके मेरी बेटी को बचा ना लेती तो मैं कहीं की भी ना रहती ।" मेहता आंटी ने एक गहरी सांस भरी।
" सही कहा आपने हमें अपनी खुशियों के साथ-साथ सावधान और सतर्क भी रहना चाहिए । आपने मुझे बहुत अच्छी बात बताई ।" रीमा ने खुशी-खुशी उनका हाथ पकड़ कर बोली ।
मेहता आंटी हंसने लगी ।
" चलो अच्छा मैं अब चलती हूं चाय उधार है वो तुम्हें मेरे घर आकर बनानी पड़ेगी वहीं पिएंगे।"
मेहता आंटी के जाने के बाद रीमा सोचने लगी मुझे अपने खाली समय को व्यतीत करने के लिए एक अच्छा उपाय भी सोचना चाहिए । क्या करूं क्या ना करूं इसी उधेड़बुन में खाना बनाने लगी । बनाते बनाते टीवी प्रोग्राम के बीच में अच्छी पेंटिंग का चित्र दिखाया गया तो सीमा के मन में विचार कौंधा ! अरे मैंने भी तो विवाह से पहले पेंटिंग का डिप्लोमा था । विवाह के बाद सब चक्कर में भुला बैठी । मुझे पेंटिंग से रिलेटेड ही कुछ करना चाहिए ।
मन में अपना प्लान बना कर खुशी-खुशी आयुष को पढ़ाने के लिए बैठ गई दूसरे दिन सामने काम निपटा कर मेहता आंटी के घर गई ।
" अरे वाह कल ही तो हम मिले थे आज तुम्हें मेरी याद आ गई यह तो बहुत अच्छी बात है " मेहता आंटी खुशी से बोली ।
" मैं आपके पास एक जरूरी काम से आई हूं । मुझे आपके एनजीओ से संबंधित कुछ जानकारी लेनी है और अपने पेंटिंग की हॉबी को आगे बढ़ाना है " , रीमा कुछ शर्माते हुए बोली ।
आंटी बहुत ही खुश हो गई यह तो बहुत अच्छा विचार है तुम्हें इस काम को करके बहुत ही मजा आएगा । साथ में मासूम बच्चों की दुआएं भी मिलेंगी ।
" और पंचायत से भी छुट्टी मिल जाएगी " रीमा की हंसी छूट गई ।
" नहीं नहीं छुट्टी तो नहीं चाहिए कभी-कभी चलेंगे ना हम भी तो फैशनेबल हैं । मेहता आंटी की मुस्कुराहट तेज़ हो गई।
💞संदेश - - कहानी के माध्यम से मैं यह संदेश देना चाहती हूं कि यदि आप साधन संपन्न है और टाइम पास ना होने की शिकार है तो ऐसी भारती आंटी हमारे चारों तरफ मौजूद है उनसे जुड़िए और अपनी खुशी के साथ-साथ दूसरों के सुख में भी भागीदार बनिए ।
राबिया शमीम

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