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चले आते हो मेरी याद में रुलाने को।
परेशा मत करो हबीब इस दीवाने को।
थी आरज़ू उन्हें ज़ख्मे ज़िगर दिखाने को
वो और रूठ गए हैं मुझे सताने को
तुम्ही चाहत हो मेरी नाखुदा हो तुम मेरे ।
बड़ी मुश्किल है सुनो अब तुझे भुलाने को।
तेरी चाहत में अपनी उम्र गुज़ारी हमने।
कभी करना न खता मुझको आजमाने को।
महक जाओगे मेरे इश्क की ख़ुशबू से सुनो।
हम वो गुल हैं जो महकाएंगे ज़माने को।
रहे थे मुन्तजिर बैठे यूं उम्र भर हम तो।
तुम्ही ने रुख़ नहीं किया गरीब खाने को।
हमारी अश्क की क़ीमत भला तुम क्या जानो
भुला न पाओगे सदियों तलक फसाने को।
दिल के पन्नों पे तेरा अक्स उकेरा हमने।
कहो न हर्फ मुहब्बत का अब मिटाने को।
निकल रहा है ख्वाहिशों का जनाजा देखो
चले आओ है सांस आख़िरी भी जाने को।
मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी उत्तर प्रदेश

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