ऊंची इमारतें ऊंचे भवन
विशाल सदन मानों चूमे है गगन
दिलों में प्यार सहानुभूति दया नहीं
बस अहम बीज पनप रहा 
पल पल भीतर ही भीतर इंसान मर रहा
दर्द भरा है सीने में
ये कैसी मची है होड़
अंधाधुंध लगी है दौड़
गाड़ी है ऊंची इमारत ऊंचा बंगला है
फिर भी इंसान अकेला है
बाहर की चकाचौंध में
भीतर से हुआ खोखला है
मन की शांति से लेना देना नहीं
सुख ढुंढता फीर रहा कागज के चंद टुकड़ों में
मयखानों में पैमानों में
उलझा हुआ है शोहरत नाम में
कभी जाम में कभी गोरे चाम में
क्षणिक आनंद ले रहा हराम में
खूद से ही फुर्सत नहीं
ना दिल में शुकुन ना आराम है
सब कुछ पाकर भी उदास है
हताश है निराश है
क्या यही उन्नति 
क्या यही विकास है????
वो जमाना ओर था जब 
बैठकर चौपालों पर
सुख दुख की बतलाया करते थे
बरगद की ठंडी शीतल छाया में
हर पल हर क्षण 
मौज मस्ती में रहा करते थे।
खुलकर गले मिला करते थे
दुःख में दहाड़ मार कर रोया करते थे
खुशी में झूम कर ठहाका मार हंसा करते थे
ना जाने क्यों बदला जमाना
क्यों बदल गए लोग
खुशी के इजहार के नाम पर
बस मुस्करा देते हैं
आंसू भी बैचारे पलकों तक आकर 
बस ठहर जाते हैं
बस ठहर जाते हैं।।

पिंटू कुमावत'श्याम दिवाना'🙏🙏 💐💐