सूनी मन की फुलवारी में, फिर से बसंत आ जाता है
ज्यों एक हवा का झोंका भी ,उस उपवन से आ जाता है।

फिर कुछ जिजीविषा जगती है,
फिर से कुछ आस निकलती है,
मुरझाई कलियां खिलती हैं,
मन फिर से गुनगुन करता है।

सूनी मन की फुलवारी में, फिर से बसंत आ जाता है
ज्यों एक हवा का झोंका भी, उस उपवन से आ जाता है।

फिर से तुलिका चल जाती है,
कुछ नए रंग भर लाती है,
फिर से वो पत्ता रंगती है,
जो अगले क्षण उड़ जाता है।

सूनी मन की फुलवारी में, फिर से बसंत आ जाता है,
ज्यों एक हवा का झोंका भी ,उस उपवन से आ जाता है।

क्यों फिर से किरन निकलती है,
क्षण भर उजियाला करती है,
ज्यों मेघ से दामिनि दिखती है,
फिर अंधकार छा जाता है।

सूनी मन की फुलवारी में, फिर से बसंत आ जाता है
ज्यों एक हवा का झोंका भी, उस उपवन से आ जाता है।

......✍️. ऋतु बाजपेई....🙏🌅