फ़ासलों में दरमियां चाहे भले हर बार हो
तेरे प्यार की कैद या मेरी रुसवा तन्हाइयां
चलूं पीछे पीछे जब भी हो तेरी परछाइयां
राह मोड़ कर  जाना नहीं मेरे जहां से
आये कितनी भी चाहें कठिनाइयां
तू सबब है सागर से ग़म का ,ए-गम नशीं
तू नहीं तो मैं भी जहाँ में कहीं हूं ही नहीं
तेरी नाराज़गी के क़िस्से क्या ख़ूब हों
गर न मनाऊँ तुझे हर बार मैं भी,
तेरे ग़ुरूर को ऐसे ही तो न संभाले हुए थे अबतक,
फिर क्या हश्र हो जो इस मामले में शामिल होंगे न जब,
ख़ुदा से फिर एक अरदास करना,
जब भी रूठे कोई महबूब अपना कोई उसके ख़ातिर
बड़े दिल का तैयार रखना
कि रख सकें महबूब के तलवों पर अपनी तेहज़ीम वो
एक दूजे का हर रंग जिन्हें स्वीकार हो,
ऐसे ही जन्म जन्मांतर हर बार हो
मैं जैसी हूँ वैसी तुझें
तू जैसा बेशक़ वैसा ही हमेशा उससे प्यार हो
ऐसे ही हर बार हमकों
एक दूजे की दरकार हो
बस तुझसे ही हो मुझे 
और
मुझे बस तुमसे ही बस 
तुमसे ही बस प्यार हो..


           भारती प्रवीण..✍️💕