गरीब भूख से मर जाता, कलाकार बनाते पेंटिंग।
निवाला देने कोई न आता लाखों में बिकते पेंटिंग।
लगाते कमरों की दीवारों पर गरीबी वाले पेंटिंग।
वही गरीब पसन्द ना आता, पसन्द आते पेंटिंग।
रास्ते पर भीख मांगता रोटी को तरसता गरीब।
उस राह के महलों में उसी की बोली लगाते पेंटिंग।
नँगे अध् खुले बच्चोंको, जो खेलने ना दे आंगन में।
वही दिखाने बिच बाजार से खरीद ले आते पेंटिंग।
कुछ गरीब का कुछ पैसो से भला ना करते कोई।
धनवानी दिखने को फिर अख़बार में छाते पेंटिंग
अपनी अपनी पसन्द यहाँ और अपने अपने शौक।
जो इंसान जैसा चाहे उसे मिल जाते वैसे पेंटिंग।
कलाकार की कलाकारी और चार चांद लग जाये।
कदरदान की कदरदानी, नाम रोशन कर दे पेंटिंग।
फिरोज दहिवाला

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