अरे सीमा जब से वृद्धाश्रम में आई हो तब से ना कुछ खाया ना पिया। मैं भी पहले पहले आई थी मुझे भी बहुत रोना आ रहा था घर परिवार जिसको जिंदगी भर संभाला और जब बच्चे बड़े हो गए तो मुझे वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। अपने आंसू पूछो बहन कुछ दिन में तेरा जी लग जाएगा यहां पर यहां पर हम लोग ही तेरे परिवार हैं। सुख दुख मैं अपने वृद्धाश्रम के लोग ही काम देते हैं। चुप रहो सीमा अब हम लोग की उम्र ही कितनी हैं 60,65 के हुए ही बहुत मुश्किल से दस साल और जिएंगे। ऐसे तो बहन में तेरी जख्म कुदरना  नहीं चाहती फिर भी अगर बताने की इच्छा हो तो बताओ नहीं तो यहां पर सारे लोगों को बच्चों ने सड़क पर या वृद्धाश्रम में लाकर छोड़ दिया है‌। कुछ के बच्चे अच्छे थे तो बहु बुरी मिली बहू के   स्वभाव के कारण ही हूं बेटे को यह कदम उठाना पड़ा। चाहे बच्चे कितने भी बुरे हो मैं तो दिल से दुआ करती हूं मेरे साथ तो बुरा कर रही हो पर भगवान तेरे साथ बुरा ना करें आखिर बच्चे तो मेरे ही हैं फलो फूलो खुश रहो। जिंदगी में खुशियां आए। चलो चलो खाने का टाइम हो गया आरती ने डंडे के सहारे उठते हुए कहा सीमा कुछ दिन में तुम भी यहां सहज महसूस करने लगोगी। सीमा कुछ नहीं बोली वह पैर के घुटनों पर दर्द की दवाई लगाते हुए बहन क्या कहूं जिस का सहारा था उसी ने छोड़ दिया अपने दर्द की बखान कैसे करूं मैं ‌ तुम लोग के तो पति अच्छे होंगे मेरे तो पति भी नालायक है। क्या हो गया वृद्धाश्रम की एक सबसे उम्र वाली महिला ने कहा हां सबके पति नहीं है पति रहते तो क्या आज वृद्धाश्रम में रहना पड़ता पति के मरने के बाद ही यहां बच्चों ने छोड़ दिया। सीमा के गले से आवाज नहीं निकल रही थी उसने अपनी दर्द भरी आवाज में कहा मैं उत्तरांचल की रहने वाली हूं तुम लोग बहुत अमीर घर की होगी या बहुत गरीब घर की और मेरे साथ कुछ दूसरी घटना है हमारे यहां सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए शादी की जाती है। मेरे मां के साथ भी यही हुआ था मैं यह रिवाज के खिलाफ थी फिर भी घर वालों ने मेरी शादी करवा दी मेरे पति ने साफ हस्ताक्षर करवा दिया था बच्चे पैदा होने के बाद तुम अलग रहना मैंने एक फार्म पर हस्ताक्षर कर दिया जिसमें लिखा था 25 साल के बाद जब बेटी का शादी हो जाए आप अन्य जगह या फ्लैट दूसरी खरीदकर रह सकते हैं। मैं कुछ नहीं कर सकती थी मैंने हस्ताक्षर कर दिया शादी होने के कुछ साल बाद बेटा हुआ अविनाश उसके 2 साल बाद टीना हुई। मैं मन ही मन खुश हुई चलो नई पीढ़ी है यह सब रीति रिवाज को नहीं मानेंगे मुझे पक्का विश्वास था बेटी मां के करीब होती है बेटा अगर बिगड़ा भी रहे बेटी मां का सहारा बनेगी। पर मुझे नहीं पता था अन्य गढ़ वालियों की तरह मुझे भी वृद्धाश्रम की शरण लेनी पड़ेगी। मैं तो पुरानी पीढ़ी की कम पढ़ी लिखी हूं बेटी को पढ़ाया लिखाया बेटा शुरू से बाप पर गया था मैं बेटी को लेकर अलग फ्लैट में रहने लगे। अविनाश के पिता ने बच्चे होने के बाद इतना प्रताड़ित किया कि मैंने उससे अलग रहना ही अच्छा समझा धीरे-धीरे अविनाश भी बड़ा होने लगा वह पिता की तरह ही बनते जा रहा था मैंने कहा भी बेटा वह सब पुराने जमाने की बात हो गई तुम हमारे साथ रह सकते हो पढ़ाई लिखाई करो पर वह पिता का ही समर्थन करता था। मैंने उसको डांट डपट कर भगा दिया। पति ने ना मुझे संपत्ति में अधिकार दिया और ना ही कुछ संपत्ति दी मैंने अपने बेटी का परवरिश अकेले ही किया बेटा जब तक छोटा रहा तब तक उसकी परवरिश की और जब बड़ा हो गया पिता की तरह ही बन गया। बेटी की भी शादी की उम्र हो गई शादी करने के बाद वह अपने पति के पास चली गई पर उसने लौट कर कभी ना आई हाल समाचार पूछा तक नहीं पूछा और ना कभी फोन की धीरे धीरे जमा पूंजी खत्म होने लगी । ऐसा समय आया कि घर भी बेचने पड़े आज खाने के लाले वाले हो गए जब जवान थी अपने और अपने बच्चों के लिए खर्चे निकाल लेते थी।बेटे और पति पर विश्वास नहीं था पर बेटी पर भरोसा था कि वह इस परंपरा को तोड़ेगी और मेरा सपोर्ट करेगी। बच्चों के लिए अपने पति से पूरी जिंदगी लड़ाई झगड़ा रहा मैं नहीं चाहती थी टीना भी इस रिवाज के चक्कर में पड़े और पुरानी रीति रिवाज को अपनाएं। टीना को मैंने पूरी छूट दे रखा था तू अपने पसंद के लड़के से लव मैरिज शादी कर ले चाहे वह अपनी जात का रहे या नहीं। पर उसने अंतिम अवस्था में सहारा छोड़ दिया। बहन अब तुम मुझे घुटना से भी चला नहीं जाता आजकल तो चक्कर भी आ रहे हैं लगता है बीपी का प्रॉब्लम हो गया है। सीमा मुस्कुराते हुए बोली चलो बहन मुझे भी भूख लगी है मैं भी तुम लोगों के साथ चलती हूं हाथ में छड़ी लेते हुए छड़ी के सहारे चलते हैं आंख से आंसू पहुंचते हुए सीमा जहां खाने बंटरहे थे धीरे-धीरे पहुंच गई।.. 

              सपना कुमारी
              बिहार पटना