चाहतों के आसमान पर कुछ पन्ने कोरे रह गए
ज़िंदगी गुज़र गई और हम अधूरे रह गए।
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तुम आए भी, पास बैठे भी, साथ भी चले
लबों में जुंबिश ना हो सकी अरमान सारे रह गए।
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मेरे नाज़ुक से दिल में जज़्बों की इठलाती सी नदी है
हुआ ना सात सुरों का संगम यह कोयल कूकती ही रह गई।
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अफसाना-ए मोहब्बत इस ख़्याल से उनको सुनाया था कि दर्द बंट जाए,
काम ना आया कोई भी मरहम जख्म़ हरे ही रह गए।
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राबिया शमीम

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