शाम का समय था। प्यास से मेरी हालत ख़राब हो गया था। प्यास बुझाने की तलप ने मुझे परेशान कर दिया था।
प्यास से मेरी जान आधी हो गया था। दूर एक कुआ नजर आया।जिस पर बाल्टी लटक रही थी। बाल्टी से बंधा हुआ रस्सी बहुत कमजोर दिखाईं दे रहा था।फिर मै लपक कर आगे बढ़ा;और बाल्टी हवा में लटक रहा था।
बाल्टी को पकड़ा और पानी निकला। पीने के बाद मुझे शान्ति मिला ।पास में एक पीपल का पेड़ था। मै उसके नीचे जाकर बैठ गया।
उस पेड़ के नीचे बैठकर मुझे वो दिन याद आ गया।जिस दिन मै पानी को लेकर एक आदमी का मजाक उड़ाया था। पानी के जगह पर उसे दूध दिया था।
ओह!... अपना परिचय देना तो भूल गया।जी, मेरा नाम मोहित कुमार है ! मै सूरत का रहने वाला हूं?मेरा बहुत बड़ा कपडे का दुकान है! द्वारिकाघिशा मेरे पूजनीय है! उस आदमी को पीड़ा मुझे आज समझ आया।
उस दिन जिस पानी का मैंने मजाक उड़ाया।उसी पानी में मुझे जीवन दिया।यह घटना आज से ठीक पांच महिने पहले की है। वह आदमी प्यास से बौखला गया था। बड़ी बड़ी आंखे प्यास के मारे लाल हो चूके थे। दुकान में भीड़ नहीं थी। लोग नहीं के समान थे।सभी अपने आप में लगे हुए थे।
उस आदमी को दुकान की तरफ देखते हुए देखकर मैंने
सुजीत को बुलाया! और उस आदमी के तरफ इशारा करते हुए कहा,... सुजीत ओ आदमी कुछ ठीक नहीं लग रहा है! जाओ देखो कही !कहीं कोई चोर तोह नहीं,उसके लक्षण ठीक नहीं लग रहे है !
जी मालिक!कहकर सुजीत उस आदमी के पास गया। उसने उस आदमी से क्या बात किया मै सुन नहीं पाया।
फटे पुराने कपडे और लाल आखो वाले इंसान को दुकान के अंदर ले आया।और सामने ही बिठा दिया।
महिला उस आदमी को देखकर वही से वापस लौट गई ?यह देख मेरा गुस्सा बढ़ गया। सुजीत पानी लाकर उस आदमी को देने लगा तोह मैंने उसे रोक दिया। उसके हाथ से पानी का गिलास लिया और खुद पी गया ।
उस आदमी को और सुजीत को ऐसे नजरो से देखा कि जैसे उसने कोई गुनाह कर दिया हो।
सुजीत फिर से दूसरा पानी का गिलास आगे बढ़ाया तो सुजीत को बड़े प्यार से मैंने कहा!
सुजीत , इन बाबा जी के लिए दूध लेकर आओ!
अभी लाता हूं? मालिक कहकर सुजीत ख़ुश होकर चला गया।वह कुछ ही मिनट में दूध लेकर आ गया।
सूजीत ने मुझे दूध दिया। मैंने उस तड़पते आदमी को एक बूंद पानी नहीं दिया था।उस आदमी को दूध दिया और कहा,
इसे पीकर मुझे तृप्त करे !यह शब्द कहते समय न मेरी मती मारी गई थी जो मै अपने आराध्य के शब्द को भी सुन नहीं पाया।
मेरी आत्म ने मुझे धिकाकर नहीं ।
उस आदमी ने मेरे हाथ में दूध को देखकर कहा,
सेठ, तुम बड़े सेठ हो! धनवान हो !पर फिर भी तुम बड़े तुच्छ हो! कपटी हो!
उस आदमी का प्यास से गला बुरी तरीक़े से सूखा चुका था।उस आदमी ने खसते हुए कहा,
उस आदमी ने दूध पास ही के गमले में डाल दिया। एक गिलास दूध गमला में भर गया।
उस आदमी ने थकपकाते हाथ से ज़मीन पर सहार बनाया और उठा गया।
उस आदमी ने दोनों हाथ जोड़ा और सुजीत को मेरे सामने धन्यवाद् कहा,
मुझे बहुत ही बुरा लगा।फिर वह आदमी पलटा और कहा,
मेरी इस हालत से तुम्हे घृणा हो रही है ! मेरे इस प्यास से तुम्हे नफरत हो गया है!
ईश्वर करे ! तुम्हारे जिन्दगी में यह दिन कभी न आए ? कहते कहते वह आदमी दुकान से बाहर चला गया।मुझे उस वक्त उस आदमी पर बहुत गुस्सा आया। मैंने उस आदमी का जाने के बाद कह कहकर बहुत मजाक उड़ाया।
कैसा बेवकूफ आदमी है,जाते जाते भी कह कहकर पूरा दिन पाग्लो की तरह हंसता रहा।
उस आदमी की बात पर मुझे जरा भी सच्चाई नजर नहीं आया।
लेकिन आज उस आदमी के पैर छूकर धन्यवाद् कहने का मन कर रहा है!उस आदमी की इंसानियत ने मुझे मरने से बचा लिया।उस आदमी के उस शब्द ने मुझे आज जीवन दे दिया। उसकी एक दुआ ने मुझे अनाथ होने से बचाया।
दो घुट पानी की बूंद जीवन के लिए बहुत अनमोल है।
लक्ष्मणी खरे 🖌️

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