भारतीय महिलाओं को प्रणाम कीजिए #8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की अगली कड़ी में मैं बात करूंगी आनंदीबाई की
डॉ आनंदीबाई जोशी जिस दौर में महिलाओं की शिक्षा दूभर थी,ऐसे में विदेश जाकर डॉक्टर की डिग्री प्राप्त करना अपने आप में एक मिसाल है।
31 मार्च 18 65 को पुणे शहर में जन्मी भारतीय पहली महिला डॉ आनंदीबाई जोशी थी।
आनंदीबाई जोशी की शादी 9 वर्ष की अल्पायु में हो गई थी और उनके पति गोपाल राव जोशी जो उनसे करीब 20 साल बड़े थे और 14 साल की उम्र में वे मां बनी थी।
यह सब जानकर आपको लग रहा होगा कि फिर वह डॉक्टर कैसे बनी?
यही आनंदीबाई का व्यक्तित्व था। जिन्होंने सभी महिलाओं को प्रेरणा दी और अपने इस अडिग स्वभाव के कारण ही उन्होंने अपना सपना साकार किया।
जब पहली बार मां बनी तो उनकी एकमात्र संतान 10 दिन के अंदर ही मृत्यु को प्राप्त हो गई और उन्हें बड़ा आघात लगा संतान खोने के दर्दने उनको यह भी सिखाया कि दूसरों का दुख कैसा होता है । असमय शिशु मौत को रोकने का प्रयास करना चाहती थी ।उनके पति गोपाल राव ने उनका भरपूर सहयोग दिया।
वहीं दूसरी तरफ उनके इस निर्णय की समाज में बहुत आलोचना हुई। उन्होंने तनिक भी परवाह नहीं की।
आनंदीबाई को 1880 में अमेरिका पढ़ने के लिए भेजा गया जिसके लिए उनके पति ने सबसे पहले अमेरिकी मिशन रिजाइल वाइल्डर को पत्र भेजा था और इस तरह से अमेरिका के वूमेंस मेडिकल कॉलेज आफ पेंसिलवेनिया से उन्होंने अपनी शिक्षा प्राप्त की।
आनंदीबाई ने 19 वर्ष की उम्र में अपना चिकित्सा परीक्षण शुरू कर दिया था।
अमेरिका में ठंडे मौसम और अपरिचित आहार के कारणों का स्वास्थ्य खराब हो गया था। उन्हें तपेदिक हो गया था फिर भी 11 मार्च 1885 को एमडी में की, विषय था 'आर्यन हिंदुओं के बीच प्रसूति' और इनके स्नातक स्तर की पढ़ाई पर रानी विक्टोरिया ने एक बधाई संदेश भेजा था।
18 86 के अंत में आनंदीबाई भारत लौट आई। जहां उनका भव्य स्वागत हुआ और कोहलापुर की रियासत में उन्हें स्थानीय अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल की महिला वार्ड के चिकित्सक प्रभारी के रूप में नियुक्त किया गया।
आनंदीबाई ने से रामपुर कॉलेज पश्चिम बंगाल हॉल में समुदाय को संबोधित किया जिसमें अमेरिका जाने और मेडिकल डिग्री प्राप्त करने के फैसले को समझाया। उन्होंने भारत में महिला डॉक्टरों की जरूरत पर बल दिया और भारत में महिलाओं के लिए एक मेडिकल कॉलेज खोलने के अपने लक्ष्य के बारे में बात की (आनंदी बाई मेडिकल कॉलेज) फिर उनके भाषण में प्रचार प्राप्त किया और पूरे भारत में वित्तीय योगदान शुरू हो गए।
अगले वर्ष 26 फरवरी 18 87 को आनंदीबाई की 22 साल की उम्र में तपेदिक से मृत्यु हो गई। इनकी मृत्यु पर पूरे भारत में शोक व्यक्त किया। गया और उनकी राख को थियोड़िसिया कारपेंटर के पास भेजा गया जिसने उन्हें अपने परिवार के कब्रिस्तान न्यूयॉर्क के पुफेकीसी ग्रामीण कब्रिस्तान में रखा और शिलालेख पर कहा गया कि आनंदी जोशी एक हिंदू ब्राह्मण लड़की थी जो विदेश में शिक्षा प्राप्त करने और मेडिकल डिग्री प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला थी।
विरासत
1888 में अमेरिकी नारीवाद लेखन 'कैरोलिन वेल्स डि डेल' ने आनंदीबाई की जीवनी लिखी।
दूरदर्शन पर 'आनंदी गोपाल' नामक एक हिंदी श्रृंखला प्रसारित की गई।
श्री कृष्ण जनार्दन जोशी ने मराठी उपन्यास 'आनंदी गोपाल' में उनके जीवन का एक काल्पनिक लेख लिखा जिसे आगे चलकर राम जी जोगलेकर ने एक नाटक के रूप में रूपांतरित किया था।
डॉ अंजलि कीर्तन ने डॉ आनंदीबाई जोशी के जीवन पर बड़े पैमाने पर शोध किया उनके समय और उपलब्धियों के बारे में एक मराठी पुस्तक 'डॉ आनंदीबाई जोशी उनका समय और उपलब्धिया' लिखी जिसमें डॉ आनंदीबाई जोशी की दुर्लभ तस्वीरें भी हैं।
भारत में चिकित्सा विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए मेडिसिंस के सम्मान में आनंदीबाई जोशी पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
महाराष्ट्र सरकार महिलाओं के स्वास्थ्य पर काम करने वाले युवा महिलाओं को उनके नाम पर फेलोशिप देती हैं।
शुक्र ग्रह पर एक गड्ढा है जिसका नाम इन्हीं के नाम पर जोशी रखा गया है। जो अक्षांश 5.5N और देशांतर 288.8E पर स्थित है।
31 मार्च 2018 को गूगल ने भी इनकी 153वीं जयंती के उपलक्ष में गूगल डूडल के साथ सम्मानित किया था।
2019 में मराठी में उनके जीवन पर एक फिल्म 'आनंदी गोपाल'नाम से बनाई गई है।
डॉ आनंदीबाई जोशी सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। आप सोच कर देखिए उस समय आनंदीबाई कितनी दृढनिश्चयि होगी। वह समाज जो उनकी इतनी आलोचना करता था कि एक शादीशुदा हिंदू स्त्री विदेश जाकर पढ़ाई करेगी। किसी को गवारा नहीं था। क्या कुछ उन्होंने नहीं सुना होगा। छोटी-छोटी बातों को लेकर हम लोग कह देते हैं कि नहीं मेरे जीवन में यह कठिनाई है इसलिए मैं कुछ नहीं कर पाती ऐसे में अपने एक प्रेरणा स्रोत डॉ आनंदीबाई जोशी को जरूर याद कीजिएगा।
#अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं
वंदना शर्मा🙏

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