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अपनों से बिख़रा,एक 'परिंदा'
कह रहा,टूटा 'औलाद' हूँ मैं 
सदस्यों के बीच रहता था जब?
उसमें प्यार पाता था मैं
अपनों से बिख़रा.......



      अपने 'जींवन' के बारे में सोचा
      राज-मौसम सब बदला-खोया
      तभी आयीं 'जींवन' में 'आँधी'
      मेरे बसे 'खंभों' को तोड़ दिया 
      अपनों से बिख़रा.......



खुशियों का 'सपना' देखा जो मैं था
एक पल में 'मौसम' मोड़ लिया
'दु:खियों-असहायों' की 'किताबें'
पढ़ना,तब से शुरु किया
अपनों से बिख़रा.......
   


     'तकदिरों' से मारा-फिरता,जब मैं था
     माँ ही याद आती रहीं 
     'आकाश' में जब,तारों को देखा
    'पिता' की आवाजें सुनाती रहीं
    अपनों से बिख़रा.......



'आँखों' में 'पानी' की कतारें,तब भी 
प्यार-'पूनम' की ओर गया 
आसरा न कभीं 'हमदर्द' मिला
'विधि' के सहारे,छोड़ दिया
अपनों से बिख़रा.......



       लेखक:-विकास कुमार लाभ
                    मधुबनी (बिहार)