मेरी अलमारियाँ
रोती है
रो -रो कर
कहती है .
ऐ री सखी
क्यों नहीं
मिलने आती
हो मुझसे
पहले मुझे
सजी सँवरी
रखती थी
अब
उथल- पुथल
करके रखती हो
कौन सी पहेली मे
उलझी रहती हो
किस भूल -भूलैया मे
भटकती रहती हो
कभी तो मिलने
आया करो
तन्हा कटते है
मेरे दिन
मुझे भी
सजाया करो
पहले मुझसे
कितना प्यार
करती थी
मेरे लिए वक्त
निकालती थी
मेरी परवाह
करती थी
कौन सी दुनिया मे
खोई रहती हो
कभी तो
आ जाया करो
मेरी अलमारियाँ
रो -रो कर
कहती है
ऐ री सखी
ना पहले की तरह
सजती -.सँवरती हो
ना मुस्कुराती हो
ना जाने कहाँ
खोई -खोई रहती हो
शिल्पा मोदी✍️

3 टिप्पणियाँ