समेट के सारे अवसाद अपने।

इकट्ठे किए हैं कुछ अनछुए सपने।

बुनते बुनते ख्वाब आंखें पथरा गई है।

मेहनत की लकीरें मेरी झुर्रियों में समा गई है।

बाल कुछ पक चुके हैं, कुछ झड़ चुके हैं।

अब दम नहीं कि दम भरूं किसी बात का।

अब दंभ नहीं है कि कहूं फिक्र किस बात का।

उमर की शाम अब करीब आ चुकी है।

जिंदगी की रात गहरा चुकी है।

बस इस सफ़र का है अंत आना।

अनंत में है अब मुझे बस समाना।।     


               नवीन पहल