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अविनाश बाबू, बड़े उच्च पद से
रिटायर हुये हैँ। अब तो उनके आराम करने का समय है। दो होनहार बेटे के पिता, अविनाश बाबू। हर कोई उनसे कहता, अरे! आप जैसा जिंदगी तो सब को मिले। दोनों बेटा अधिकारी है। आपकी जीवन सांगिनी भी एक समझदार औरत है। आप के जीवन में कोई दुःख नहीं है। हर कोई आप से प्रभावित होता है। इस कामयाब जीवन का राज क्या है।
अविनाश बाबू, अपने इस कामयाब जीवन के पीछे की संघर्ष कि कहानी लोगों को सुनाते हैं और ले चलते हैं, अपने घर के पीछे बने गेराज में। गेराज साफ सुथरा था। रोज सुबह गेराज कि सफाई होती है तो साफ तो रहेगा ही। एक तरफ बड़ी सी गाड़ी खड़ी है, पूरे परिवार के साथ अविनाश बाबू जब कहीं जाते तो ये गाड़ी इस्तेमाल होती। बगल में ही दो मोटर साइकल लगी है जो उनके दोनों बेटों की है। गेराज भी तो बहुत बड़ा है। अविनाश बाबू गेराज के और अंदर जाकर खड़े हो जाते हैं और अपनी कामयाब जिंदगी के साथी को छू कर बोलते हैं कि आज जो कुछ भी हूँ तेरी वजह से ही हूँ। हर कोई मुझसे कहता है कि अब तुझे अपने से अलग कर दू लेकिन, नहीं। मैं अपने जीते जी तुम्हें अपने से अलग नहीं कर सकता।
अविनाश बाबू अपने आप से बातें करने लगते हैं, आज मैं जो कुछ भी हूँ, जो भी मेरे पास है उसमें तुम्हारा ही सहयोग है। मेरा दोनों बेटा अगर आज कामयाब है तो, तुम्हारे साथ के कारण। जिस से अविनाश बाबू इतनी देर से बात कर रहे थे वो कोई और नहीं, उनकी और उनके दोनों बच्चों की वहीं पुरानी साइकल थी। जिसके सहारे अविनाश बाबू अपने दफ्तर और उनके दोनों बच्चे अपने स्कूल कॉलेज का सफर तय करके यहाँ तक पहुचें। वो तीनों पुरानी साइकल आज भी अविनाश बाबू रखें हुये हैं क्योंकि जिंदगी का साथी कितना ही पुराना क्यू ना हो जाये, उसे जीते जी अपने से अलग नहीं किया जा सकता
श्वेता कर्ण

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