छिपे हैं समंदर में, 
मोती बहुत, 

बस एक बहाव, 
देता है किनारा, 

ज्यौं सागर में, 
कश्ती को मिले, 
किनारा, 

छिपे हैं समन्दर में, 
मोती बहुत, 

बहे रस धार, 
जब काव्य की, 

उपजे अन्तर्मन से, 
उद्भव होते, 
उदगार,

छिपे हैं समन्दर में, 
मोती बहुत, 

कल्पना कवि की, 
लेती आकार, 

सीप से मोती, 
ज्यौं निकलने को, 
है बेकरार, 

छिपे हैं समन्दर में, 
मोती बहुत, 

झांका जब मोती, 
सीप से बाहर, 

झट उसे कवि ने, 
लिया झेल, 
गूंथने माला, 

छिपे हैं समन्दर में, 
बहुत मोती, 

कल्पना कवि की, 
रंगों से सजा दिया, 

कवि के उदगार, 
रंगा रंग, 
रंगों से सरोबार, 

छिपे हैं समन्दर में,
मोती बहुत, 

भेद छिदा मोती, 
निकली इक आह, 

क्रन्दन मोती का, 
चीत्कार, 
फ़टा हृदय मोती का, 

छिपे हैं समन्दर में, 
मोती बहुत, 

न सुना किसी ने, 
आर्तनाद उसका, 

मुग्ध होकर, 
देख रहा था, 
रुप सौन्दर्य उसका, 

छिपे हैं समन्दर में, 
मोती बहुत, 

पिरो दिया कवि ने, 
एक एक मोती, 

शब्द ज्यौं मोती, 
चुन चुन कर, 
बनी माला, 

छिपे हैं समन्दर में, 
मोती बहुत, 

सृजित काव्य के, 
मोती बेशकीमती, 

सृजन की हो उठी,
मुद मुखरित, 
धार पैनी, 

छिपे हैं समन्दर में, 
बहुत मोती, 

नामचीन बना, 
पटल पर जहाँ के, 

आलम प्रसिद्धि का, 
नभ धरा में, 
छा गया, 

छिपे हैं समन्दर में, 
बहुत मोती, 

छिपे हुये मोती, 
गुंजित आसमां में,

सृजन काव्य,
हासिल बुलन्दियाँ, 
इस जहाँ में, 

छिपे हैं समन्दर में, 
बहुत मोती, 

छिपे मोती ने, 
रोशन कर दिया जहाँ, 

आसमां में छिपा, 
था जो सितारा,
चमक गया, 

छिपे हैं समन्दर में, 
मोती बहुत, 

चमका वो सितारा, 
महका गया, 

गुल गुलिस्ताँ, 
धरा पर, 
आशियाँ बना दिया,

छिपे हैं समन्दर में, 
बहुत मोती, 

बह रही अनवरत, 
अटूट काव्य धारा, 

काव्य का अन्नत,
भंडार अनोखा, 
अतुलित, 

छिपे हैं समन्दर में, 
मोती बहुत, 

यौवन पर है, 
धारा काव्य की, 
समन्दर से जहाँ में,

अनोखा संसार, 
काव्य का जहाँ में, 

बिखेर दिये, 
जगत में कवि ने, 
कितने रंग, 

सतरंगी दुनिया में, 
इन्द्रधनुष से रंग, 

छिपे हैं समन्दर में, 
बहुत मोती ।

     काव्य रचना -रजनी कटारे 
          जबलपुर (म. प्र.)