बात बहुत समय पहले की है, हमारे घर के सामने एक छोटा सा घर था... जिसमें एक कमरा और एक रसोईघर था... माँ बेटे दो ही लोग थे... माँजी की उर्म लगभग पचास के आस पास होगी..... सुना था बेटे की शादी हो चुकी है....
पर कभी उनके घर में बहु तो दिखी नहीं.......
खैर जो भी हो....अपन क्यों किसी के फटे में टाँग अड़ायें. भई अपने आदत तो नहीं है किसी की बखिया उधेड़ने की... सो कभी पूछा भी नहीं.....
दो दिन से उनके घर में ताला पड़ा नज़र आ रहा था,
गये होंगे कहीं अपन को क्या...? कोई अपन को बताके
तो गये नहीं...अपन को क्या गरज पड़ी !!
दूसरे नींद खुली हमारी... नित्यकर्म से निवृत्त हो... चाय
का प्याला लेकर बरांडे में आ खड़े हुये....
सो हमने देखा!! सामने वाली खिड़की का परदा सरका,
सुंदर से चेहरे ने झांका बाहर... हम हतप्रभ!!
भई ढोल ढमाका कुछ नहीं.... बहुरानी हाजिर....
वा भई ये भी खूब रही.... अब जब देखो.... पायल
और साथ में गीत की मधुर आवाज.....
"मोरी छम छम बाजे पायलिया मोरी छम छम बाजे....
आज मिले हैं मोरे सांवरिया मोरी".....
दूसरे दिन फिर वही सुंदर सा चेहरा झांका खिड़की से.... धीरे से परदा सरक गया....
शारद माँ बेटे दोनों ही नोकरी पे जाते थे... ज्यादा किसी
से मेल-जोल भी न था उनका किसी से....
थोड़ी देर बाद ही पायल की आवाज के साथ सुमधुर
गीत की आवाज खिड़की से आती हुयी...
हवा के मंद मंद झोंकों के साथ......
"पिया बसंती आ गया मस्ताना मौसम आ गया".....
मैं बरांडे में ही खड़ी थी....किसी के फटे में टाँग तो
नहीं अड़ाना... पर उत्सुकता तो थी न...... पिय के रंग
में रंगी बसंती खैर!! देखा मैंने वह सीढ़ियों से उतरकर
नीचे आ रही है.... छम छम पायल छनक रही.... पीले
पीले परिधानों में चाँद सी खूबसूरत.... कजरारी कटीले
से नयना.... उसने ऊपर देखा!! हँसी देखकर....
श्वेत दंत पंक्ति.... मुखड़े पर हँसी बड़ी प्यारी सी....
उसने नीचे से झट कुछ उठाया और दौड़ गयी सीढ़ियों
से ऊपर....शायद ऊपर खिड़की से झांकते समय कुछ
गिरा होगा........
आज बसंत पंचमी थी... इसी लिए पीले पीले परिधान
में नज़र आयी वो.... पीले रंग की चूड़ियाँ साथ में पहने मैचिग की......
फिर वही सुमधुर आवाज...खिड़की से आती हुयी..
"पीत रंग चुनरी ओढ़ी मैंने, पिय तेरे नाम की".....
फिर एकदम से गाना.... दूसरा शुरु हो गया....
"संग बसंती अंग बसंती रंग बसंती छा गया,मस्ताना
मौसम आ गया".....
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कहानीकार-
श्रीमती रजनी कटारे
जबलपुर (म. प्र.)

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