जब तक "प्रलय" न आ जाये, दुनिया की शाम कैसे हो सकती है ,खैर... 
शिरीष एक प्रायवेट कम्पनी में काम करता था, उसकी तनखा भी कुछ खास नहीं थी ,फिर भी पति -पत्नी खुशहाल जिंदगी जी रहे थे, श्यामली सुंदर तो थी ही, बड़ी ही सुसंस्कृत और खुशमिजाज़ भी थी, उसके चेहरे पर संतोष अलग ही झलकता था -
शिरीष बहुत सीधा -सादा, अपने मतलब रखने वाला -
घर से आफिस और आफिस से घर, वो आफिस से समय पर घर आ जाता था, उसका रोज का यही रुटीन था -
उसके कोई ज्यादा दोस्त भी नहीं थे, दोनों पति -पत्नी रोज 
शाम को घूमने निकल जाते, कभी पार्क में तो कभी ,
चोपाटी तक घूम कर आ जाते -
शाम का समय था और वो भी छुट्टी का दिन -
श्यामली अपने रोजमर्रा के कामों में लगी थी, 
शिरीष अपने सोफे पर बैठा टी. वी. में कोई मूवी ,
देख रहा था.... 
तभी उसे श्यामली के मोबाइल की रिंग सुनाई दी- 
श्यामली अपने काम में व्यस्त थी, उसका ध्यान नहीं 
था...फिर  से रिंग बजने लगी... 
अब शिरीष ने मोबाइल उठा लिया - 
उसमें किसी की अनजानी आवाज सुनायी दी -
हैलो- ' जानेमन ' फोन क्यों नहीं उठा रही... 
शिरीष को कुछ समझ नहीं आया, उसने फोन काट दिया -
शिरीष के मन में 'उथल -पुथल' शुरु हो गयी, 
किसका फोन होगा ?
क्या बात है ?
ऐसे क्यों बात कर रहा था? 
उसके दिमाग में रहरह कर प्रश्न कोंध रहे थे -
कुछ तो चक्कर है ,वह यही 'सोच-सोच' कर परेशान हो 
हो रहा था ,वो बहुत अनमना सा हो गया -
उसके दिमाग में तो ' उधेड़-बुन 'चल रही थी... 
श्यामली अपना काम निपटा कर, शिरीष के पास बैठकर ,
वो भी मूवी देखने लगी, पर शिरीष का मन मूवी देखने में, 
नहीं लग रहा था, वो उठकर ' चहल-कदमी ' करने लगा -
फिर बोला... मैं बाहर घूम कर आता हूँ! 
ऐसा बोल कर बाहर निकल गया... 
श्यामली को उसका व्यवहार बड़ा अजीब सा लगा, 
फिर भी उसने ध्यान नहीं दिया -
दूसरे दिन शिरीष जल्दी से तैयार होकर आफिस के लिए जाने लगा - तभी श्यामली नाश्ता और टिफिन भी लेकर, 
आ गयी -बोली नाश्ता तो कर लो ,आज इतनी जल्दी आफिस जा रहे हो... मुझे नहीं करना...कह कर जाने लगा... 
अरे - ये टिफिन तो लेकर जाओ... रहने दो -
कह  कर निकल गया -
श्यामली बड़ी परेशान, इन्हें हुआ क्या है? 
उसे कुछ समझ में नहीं आया, उसका काम में मन ,
नहीं लग रहा था... 
शिरीष इधर -उधर समय पास करके, आफिस चला गया -
आफिस में भी उसका मन लगा , किसी से ढंग से बात भी नहीं करी -आफिस में काम को लेकर झड़प हो गयी, 
जैसे तैसे आफिस का काम निपटाया, आफिस छूटने का
समय भी हो गया -
आफिस से निकल कर, उसने गाड़ी उठायी ,
और निकल गया, मन उसका बहुत अशांत था -
वो सोचता जा रहा था, तरह -तरह के विचार मन में ,
आ रहे थे -मेरी लिए तो दुनिया ही खत्म हो गयी -अब जीकर मैं क्या करुंगा ? कौन है मेरा? सब धोखा है -
सोचते सोचते कब नदी का किनारा आ गया -
शाम करीब ढलने को ही थी -
वो गाड़ी से उतरा और वहाँ पास में ही लगे, 
बिजली के पोल पर चढ़ गया, उसे तो अपनी जिंदगी ,
जो खत्म करना थी -
इतना खुशनुमा मौसम देख कर उसके दिमाग में, 
विचार कौंधा -
मैं क्यों अपनी जिंदगी खत्म करुं ?
यही विचार मन में आते ही, वो मस्ती में लहराकर, 
झूलने लगा, वहाँ का नजारा देखकर कर उसका तो मन ,
ही बदल गया, वो उस पल में मशगूल हो, फिर से खुशी में, 
झूमने लगा -
तभी उसे जोर से चिल्लाने की आवाज सुनायी दी -
अरे ! ओ भाई... ओ भाई... मरना है क्या  ?
नीचे आ जा भाई.......
हाँ आया तो मरने ही था....ऐसा कह कर, वो नीचे उतर आया......
यहाँ का बेहतरीन नज़ारा देखकर मेरा मन बदल गया... 
निराश होकर, मैने सोचा था....मेरी तो दुनिया ही खत्म हो गयी......
पर नहीं मेरे ' यार ' दुनिया ऐसे ही खत्म नहीं होती -
मेरा तो यहाँ आकर नजरिया ही बदल गया... 
शुक्रिया... मेरे दोस्त अब चलता हूँ -
अंधेरा भी हो गया था, शिरीष ने गाड़ी उठायी...चल दिया अपने घर की और..... 
घर पहुँच कर देखता है....उसकी पत्नी हैरान परेशान -
इधर से उधर घूम रही थी.......
शिरीष को देखते ही, वो रुआंसी हो गयी....उसका गुस्सा फूट पड़ा........
शिरीष बोला -क्या हो गया  ? 
क्यों परेशान हो  ?
एक तो आपने आने में इतनी देर लगा दी-
शयामली ने कहा ...ऊपर से ये फोन काल... 
किसी सिरफिरे का था, दिमाग खराब करके रख दिया -
वो बोला -कुछ बताओगी भी... 
पता नहीं कौन था  ? ऊल जलूल बातें कर रहा था -
मैंने गुस्से में फोन पटक दिया.......
अब उससे आपको फोन भी नहीं लगा पा रही थी.....
शिरीष को अब सारा माजरा समझ में आ गया था.......
बेकार में ही मैं अपनी पत्नी पर शक कर रहा था.....
शिरीष ने बड़े ही प्यार से उसे गले लगाया...... 
और बोला कोई बात नहीं, दूसरा मोबाइल दिला दूंगा.....
सिरफिरे तो होते ही ऐसे हैं -लगा दिया कोई भी नंबर, 
सामने वाले को परेशान करने.....
खेर छोड़ो, ये  सब..... 
बढ़िया सी चाय बनाओ... तब तक मैं फ्रेश होकर, 
आता हूँ - कह कर वो अंदर चला गया.....
श्यामली तब तक चाय लेकर आ गयी...दोनों साथ बैठकर चाय पीने लगे....शिरीष बोला -चलो तैयार हो जाओ -
घूम फिर कर....बाहर ही खाना खाकर आयेंगे- 
तुम्हारा मूड भी फ्रेश हो जायेगा... 
दूसरे दिन, शाम का समय था, श्यामली पति के इंतजार में बरान्डे में बैठी था...... 
फिर उसने सोचा शिरीष तो अभी आफिस से, 
आते ही होंगे!!
तब तक मैं चाय -नाश्ते की तैयारी कर लेती हूँ -
फिर वो अन्दर चली गयी.....
थोड़ी देर में ही पदचाप सुनाई दी.....
शिरीष मस्ती में कुछ गुनगुनाता आ रहा था, 
वह आकर बरान्डे में कुर्सी पर, अखबार लेकर,
पढ़ने बैठ गया......
श्यामली तब तक चाय के साथ गर्मागरम पकोड़े ,
लेकर आ गयी.....
श्यामली भी वहीं दूसरी कुर्सी पर बैठ गयी -
दोनों चाय के साथ पकोड़ों का लुत्फ उठाने लगे... 
श्यामली अन्दर जाकर, खाना बनाने, 
किचिन में चली गयी.....
शिरीष भी अन्दर आ गया, उसने देखा -
श्यामली किचिन में है-- 
वो किचिन में जाकर बोला....
ये सब छोड़ो -चलो कहीं बाहर घूम फिर कर आते हैं -
बस -मैं पाँच मिनिट में आई... 
वो फटाफट तैयार होकर आ गयी -
और दोनों साथ में घूमने निकल गये...। 
       

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       कहानीकार -रजनी कटारे 
             जबलपुर (म. प्र.)