समय की अभिधा मैं किसे दूं ?
बचपन की अठखेलियों में
आंख मिचौनी खेलता समय,
या प्रेम-समन्दर में  नैया खेता,
इक क्षण में ओझल हो जाता समय,
या मृत्यु शैय्या के सिरहाने,
द्रौपदी के चीर सा लगता समय,
या योगी के नैन मूंदते ही,
युगों - कल्पों में बदलता समय,
ये समय की परिभाषा,
अलग-अलग जगह पर,
अलग-अलग अर्थों में,
एक अनेकार्थ का बोध क्यूं कराती ?
बचपन के अनजाने खेल में,
प्रेमियों के  हृदयों के मेल में,
मृत्यु के दुखदाई क्षणों में,
परमानंद के शून्य क्षणों में,
बदलने का स्वांग क्यूं करता है समय
सच में  आनंद में घट जाता समय
दुख-दर्द में ठहर सा जाता‌ समय
समय बनता चलता मन से,
मन के अलग रंग-ढंग से,
चलिए अमन की बात करते,
या  तो समय के साथ चलते,
या समय के पार चलते...।
*****  ©मीनाक्षी मीरा
         रोहिड़ा (माउन्ट आबू)
           राजस्थान