तुम गुरुता....
अनुग्रह की गंगोत्री से
उतरी मौन अनुभूति हो
और क्षुब्ध ह्रदयस्थल में समाती समानुभूति हो
तुम करुणा बन....
दग्ध तिरस्कृत मन को
शीतल स्नेह गंगा से
नित पावन करती हो
और अग्निपरीक्षाओं में
अनुराग के आश्रय से
स्नेहल पनाह देती हो
तुम श्रद्धा बन...
शुभाशीष से जीवन को
सिंचित कर उद्धार करती हो
और तुम करूणामयी नैनों से कृपा की वर्षा करती हो
तुम क्षमा बन....
अनगिनत गलती में
प्रभात सा प्रकाश भरती हो
और श्रद्धापूरित कर
प्राणों में प्राण भरती हो
हे मंगलमयी ममता...
तुम प्रेम की पर्याय हो
या प्रेम की प्रतिमूर्ति हो
तुम प्रेमारोहित मेरी श्रद्धा हो
हां..तुम मेरी लघुता को पूर्ण करने वाली प्रेरणा हो
तुम परम पूज्यता हो
और मेरी परिपूर्णता हो
तुम परम प्रिय सद्गुरुता हो
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सद्गुरु को समर्पित
रचनाकार - मीनाक्षी कुमावत'मीरा'
रोहिड़ा (पिंडवाड़ा) माउन्टआबू,राजस्थान

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