एक वो भी दौर गुजरा पिछ्ले साल,
जब अपनेपन का एहसास हुआ
अपनों का एहसास हुआ
अपने होने का एहसास हुआ।
जाने कहां बिखर गये थे,
अवशेष मात्र रह गये थे
टुकड़े यहं। वहाँ पड़े थे।
इकठ्हा हुए जुडे सारे,
जिन्दगी के धागों के साथ।
पिरोये थे मोती चुन चुन कर
जीवन रुपी धागे में,
वक्त ना मिला था पर
बेतहाशा चली जा रही थी जिन्दगी,
दो पल रुक ना सकी।
बरसों बाद हंसी खुलकर,
बड़ी सुकून थी उसमें,
पाया सुकून भर ।
ना आगे की चिन्ता 
ना पीछे का गम,
कुछ छुट गया,कुछ मिलेगा आगे
ना थी इसकी जद्दोजहत।
जो धागे हमने पिरोये मिलकर,
रखना इसे संभालकर,
फिर मिले ना मिले 
वो फुर्सत के छण,
तब करेंगे याद 
और पायेंगे सुकून
फिर रहे ना रहे हुम।।

                          ---  डॉली मिश्रा✍️