मदरसे की लड़कियां हो,
शिक्षा और संस्कार में नंबर वन,
या अनपढ़ लड़की हो कोई गाँव की
अग्नि परीक्षा सा जीवन हर नारी का।

उच्च पद पर कार्यरत
या गृहिणी अपने परिवार की
कर्म भले ही अलग-अलग 
पर नीयती एक हर नारी की।

ममता के आँचल में स्नेह छूपा, 
रहती हर पल संघर्षरत
घर मेंं जो खुशहाली भर दे 
चेहरे पर तेज, त्याग की प्रतिरूप 
करती खुद को कुर्बान वो।

औरों की रक्षा में भूला अपमान,
दांव पर भी लगाती है जान 
कठिन राह पर अग्रसर हो 
औरों का करती सम्मान वो।

तीज त्यौहार हो या हो बीमार
चाहे  मिले ठोकर हजार
खुद से पहले अपनों के लिए 
रहती हर पल तैयार वो।

रक्त से सींच कर अंश लाती धरा पर
त्याग अपने जीवन की सारी खुशियां,
अग्नि परीक्षा लेते जब अपने ही लाल वो
टूटकर बिखर जाती ना कर पाती सवाल वो।

                            अम्बिका झा ✍️