कभी कभी अपना साथ भी लगता है मुझे
दिसम्बर ओर जनवरी का साथ..,
तुम्हें रहता जल्द जाने हरपल इंतज़ार
मैं रहती लौट आने को बेक़रार 
तुम हो शाबो शबाब में आती सर्दी से..,
वहीं मैं 
थोड़ी गर्माहट चाहती गलन सी..।
तुम साल भर सा तज़ुर्बा रखते हो अपने पास हमेशा ..,
पिछला भुलाने की हौड़ में नए सिरे से उम्मीद जगाती मैं हर रेशा..।
तुम परखते हो संग कारण के लिये
मैं प्रेम में नई सम्भावना ओर प्रयास के लिये..।
तुम बिताते उदासी जाते भरे त्यौहार से..,
मैं आती संक्राति की ग़ज़क ओर खट्टे मीठे अचार से..।
तुम सीमटती सालभर की  फ़ाइल की भरमार..,
मैं पुरानी किताबों के ज़िल्द का नया अख़बार..।
यूं तो दिसम्बर झरोखां प्रमुख सारे साल का..,
ओर जनवरी का आगाज़ भी
नए साल के नाम का..।
आगे बढ़ते हो दिसम्बर तुम अबतलक जिम्मेदारी सारी लेकर..,
पीछे पीछे तेरा जिम्मा ओर वादा निभाने सँग लेकर ..।
तुमने बनाये निर्णय नियम मेरी *नई* पहचान  के लिये ,
निभाने की कसम अपने कंधे पर ठान के लिये..,
तुम तो चले जा रहे हो जैसे हरबार 
बताकर सारी मेरी नियमावली..,
हां भरती गयी मैं भी बावली
वही पुरानी नई बनती जनवरी तुम्हारी
सँग नन्हे महीनों को लेकर पुनः पधारी
ग्यारह माह का भार तुम तो उतारकर 
मुझ पर सब जिम्मेदारी वार कर
जा रहे सारे तमगे लाद कर
पर इतना तो कहते जाना ..
मुझ पर फिर प्यार जताना..

सुनो जनवरी !!
निभा सको उतना निभाना..
बेवज़ह मत सिसकिसाना..
मेरा साथ फिर होगा पाना
मैं जल्द आऊंगा सुन जाना
कुछ महीने बस मौज में बिताना
तू उसपार ही रहेगी बेशक़
पर छूटता नहीं दिसंबर जनवरी सँग आना।।
फिर जुदा जुड़ा न हमको बताना।।
उसपर तुम्हारा ये कह जाना
बाकी महीनों के साथ लगता तुम्हे अच्छा समय बिताना..!
कहने को तो हमारा साथ कितना आस पास है
पर रहती इतने महीनों बाद मिलने की आस है,
जनवरी हु दूसरे साल का नाम भले हो जुड़ा..
पर ख़्याल रखना हमेशा तेरे कदमों की ओर ही मुड़ा।।



             भारती प्रवीण...✍️💕