बारिश बाहर भी हो रही थी और दिल के अंदर भी.... शायद अब इस बरसात का मौसम कभी नहीं बदलेगा ।
पड़ोस के बूढ़े अंकल जो आज भी रेडियो सुनने के शौकीन है मुझ अभागन की हालत बयां करने वाला गाना सुन रहे हैं ।
कल चमन था आज ये सहरा हुआ
देखते ही देखते यह क्या हुआ.....
धीरे से मैं बालकनी से पीछे हट कर अंदर आ गई दो मासूम अमानत आर्यन और ईशान 10 और 12 बरस के रोते हुए और भगवान से झगड़ते झगड़ते नींद के आगोश में चले गए । यह बच्चे जरूर हैं पर इतने भी नासमझ नहीं कि अपने जान छिड़कने वाले पापा को पुकार भी ना पाएं ।
बेड पर जरा सी जगह बनाकर मैं इन्हीं के बीच में टिक कर बैठ गई । नींद से तो अब दुश्मनी सी हो चली है ।
बार-बार 4 साल पुरानी यादें और उस बूढ़ी काकी के अल्फाज़ कानों में गूंजने लगते हैं । आंख बंद करूं तो उसका चेहरा घूमने लगता है । हलक में आंसुओं का फंदा लग गया । उठी ज़रा कि पानी पी लूं तो साइड टेबल पर रखा सिंगापुर से लाया क्रिस्टल का खूबसूरत जग मुझे चिढ़ाने लगा । थोड़ा सा पानी पीने की कोशिश की मगर वह भी अंदर जाने से इंकारी हो गया । मैं खड़ी हुई इधर उधर टहल के सोच रही थी कि सांसे ही क्यों बची है , यह भी क्यों न रुठ गईं मुझसे ....
फिर लेटी और उस बूढ़ी काकी से पीछा नहीं छुड़ा पाई ..
4 साल पहले
आज ही आज हमारी सिंगापुर की फ्लाइट थी आदित्य पुकारे ही चला जा रहा था ।
" अनन्या ! अनन्या ! चलो तुम देर ही कर देती हो हमेशा "
" अच्छा क्या देर ? तुम्हारे यह दो शेर हैं । इनकी भी तो तैयारी मुझे ही करनी होती है तुम तो बस घर की सेटिंग ही कर रहे हो"
" हां तो पूरे 4 साल के लिए बाहर जा रहे हैं घर को सही से बंद करना पड़ेगा कि नहीं चलो बैठो गाड़ी में ...
अब बैठ भी जाओ मैडम ! भले ही कंपनी भेज रही है फारेन पोस्टिंग पर मगर ले तो मैं जा रहा हूं इतनी दूर । कोई ले जाता है जरा बताओ "
नहीं ..नहीं ...जी नहीं मैं मुस्कुराई थोड़ी दूर जाकर याद आया कि पानी की बोतल घर पर रह गई तो आदित्य को पुकारा
सुनो वह पानी... गुस्सा मत करना प्लीज घर में ही रह गया।
बस यही रह गया था एयरपोर्ट पर मिल जाएगा उसने मुझे टाला ।
अरे 2 घंटे हैं मेरा तो नाश्ता हलक़ में फंसा हुआ है । मैंने ज़िद की।
कोई बात नहीं मैम आगे जाकर एक रेस्टोरेंट आएगा वहीं से ला दूंगा ऑफिस का ड्राइवर बोला हमारा झगड़ा देखकर।
जैसे ही कार रुकी छोटा इशान भी भागकर पापा के पीछे लपका और वहीं तरह-तरह के छोटे खिलौने सजाए जमीन पर वो बैठी थी उसके पास जाकर झट खिलौना उठा लिया।
मैंने इशान से खिलौना छीनकर वही डाल दिया ।
" गंदा है बेटा इसे नहीं छूते " बस इतना ही कुसूर था मेरा ।
अरे बिटिया ! ले लेने दो वह शायद पहले से ही गरीबी से परेशान थी और गुस्से और रोने की मिली-जुली आवाज से बोली ,
आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे ..
वक्त की हर शय ग़ुलाम
वक्त है सबसे बड़ा !
जल्दी से कार में मैं बैठ तो गई मगर सिंगापुर जैसे हसीन शहर पहुंच कर भी उसकी रोशनी में खोकर भी कभी-कभी वो बेज़ार सूरत मेरे जहन में उभरती रहती ।
सितंबर का नम नम सा मौसम था वहां आदित्य हमें सैटोना द्वीप घुमाने ले गए । प्रसिद्ध मेरेलिनियन मूर्ति को एकटक घूरते हुए आदित्य मुझसे बोला ,
" कितना खूबसूरत समय है ना ! कितना शांत बीच और क़ुदरत का करिश्मा देखा तुमने। "
" हां सब तुम्हारे साथ की वजह से है तुम ने मुझे सब कुछ दिया।" मुझे उसपे बेइंतहा प्यार आया।
हर तरह की खुशी थी हमारे पास । हमारे दो प्यारे बच्चे बीच पर अपना घरौंदा बना रहे थे लहर बार-बार उसे तोड़ रही थी फिर आदित्य उनके पास चला गया दोनों को अपने गले से चिपका कर बोला ,
" कभी मैं रहूं या ना रहूं अनन्या इन फूलों का ध्यान रखना"
मैंने झट उसके मुंह पर हाथ रख दिया । हम फिर टहलने लगे
" पता है अनन्या ! मैं और तुम दोनों एक छोटे से गांव के रहने वाले हैं । हमेशा से ही भाग्य मेरे साथ रहा पढ़ाई में मैं हमेशा आगे पहले जल्दी से नौकरी मिली फिर तुम , ईशान .. आर्यन और आज ऊपर वाले की दया के बदौलत आसमान चूम रहे हैं
कभी-कभी मुझे डर लगता है है " आदित्य ने आसमान की तरफ ऐसे देखा जैसे शुक्रिया अदा कर रहा हो।
" तुम्हें भी डर लगता है मुझे भी .... अच्छा चलो छोड़ो यह सब अब घूमते ही रहोगे कि यहां बच्चों का एडमिशन भी कराना है।"
मैंने बातों का रुख़ मोड़ा ।
फिर तो घूमते फिरते एंजॉय करते जिंदगी चार साल पंख लगाकर उड़ा ले गई । 4 साल की अवधि पूरी हो गई साथ में आदित्य और मेरा साथ भी ।
हमारे वापस इंडिया आते ही 2 हफ्ते तक ना जाने कौन सा सर दर्द और टेंशन लगातार उसे बना रहा 1 दिन बेहोश हो जाने पर टेस्ट करवाया रिपोर्ट ब्रेन ट्यूमर की थी ।
दुख की बदली हमारे घर पर छा गई । ऑपरेशन एक उम्मीद थी जो नाकामयाब रहा ।
आदित्य के कोमा में जाने के बाद 20 दिन का वेंटिलेटर मुझे करची करची तोड़ता था ।
मौत की आहट दबे पांव होती है मुझे ,
यक ब यक छूटा साथ तेरा तो किधर जाऊंगी...
मौत ! ! ! आखिरकार उसे आना ही था और वह ले ही गई मेरे आदित्य को । तब से तो रात ही रात है मेरी सुबह ना हुई ।
जाने कैसा आसमान है मेरे सूरज को निगल गया।
राबिया शमीम

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