अक्सर एक पुरुष और एक स्त्री के मन में उठे आकर्षण को ही प्रेम कहा जाता है। पर प्रेम शव्द का अर्थ बहुत गहन है। चाहत एक दोयम विचार है। जबकि त्याग और बलिदान के हवन से पवित्र प्रेम एक पूजा है। जिसने वास्तव में प्रेम कर लिया, उसे शायद किसी भी तप, दान, पूजा की जरूरत नहीं है। सभी विचारधाराओं को पार कर जो विचारधारा जन्म लेती है, वही प्रेम है। पर इस तरह कितने सोचते हैं। तभी तो हर प्रेम कहानी अक्सर स्त्री और पुरुष की चाहत के आसपास घूमती है। बसंत सेे लेकर फागुन तक का हर महीना स्त्री और पुरुष की चाहत को और बढाता है। बरसात के महीने में जब मोर नाचते हैं या किसी बाग में कोयल कूंजती है तो  दो प्रेमी अपने मन की चाहत को रोक नहीं पाते।

   अगर मनुष्यों में ही प्रेम की बात की जाये तो केवल लङका और लङकी के मध्य ही प्रेम नहीं होता है। एक माॅ और बेटे के मध्य, भाई और बहन के मध्य, दोस्तों के मध्य क्या प्रेम नहीं होता। उससे अलग प्रेम तो जीव का जीव से होता है। प्रेम तो देश से भी होता है। प्रेम तो मानवता से भी होता है।

  इन बातों पर कोई यकीन करे या न करे। पर बर्फीली पहाड़ी पर रुके ये सैनिक जरूर इन बातों पर यकीन करते हैं। तभी तो हाङों को गलाती इस सर्दी में यहाँ टिके हुए हैं। दुनिया में सर्दी, गर्मी, बरसात, बसंत जैसे अनेकों मौसम होते हैं। पर इस पहाङी पर हमेशा एक ही मौसम रहता है। अंतर इतना है कि शून्य डिग्री तापमान को गर्मी का और माइनस बीस डिग्री तापमान को सर्दी का मौसम कहा जाता है।

   हर महीने वर्फ के तूफ़ान में कोई न कोई गुम हो जाता है। अक्सर पेट्रोलिंग करते समय बहुत पहले शहीद हुए सैनिकों की लाशें मिल जाती हैं। ठंड में महीनों बाद मिले शव भी एकदम सुरक्षित मिलते हैं। फिर उन्हें उनके घर तक पहुंचाना भी कोई आसान काम नहीं था।

   खाने में ज्यादातर ब्रेड ही मिलतीं हैं। कोई ब्रेड का कितना भी शौकीन हो, कब तक ब्रेड खा सकता है। पर पहाङी पर और कोई साधन न था। वह भी हैलीकोप्टर से ब्रेड और मक्खन पहुंच जाता। नहीं तो यह भी नहीं मिलता। पर किसी के जज्बे में कोई कमी नहीं थी। 

      फरवरी का महीना था। इन दिनों मैदानों में बसंत ऋतु का काल कहा गया है। पर पहाङी पर वर्फ की चद्दर के सिवाय कुछ नहीं है। कल राशन लाने बाला हैलीकोप्टर खराब मौसम की बजह से आ नहीं पाया। वापस चला गया। हालांकि अभी पांच छह दिनों का राशन है। पर मौसम का मिजाज थोङा ठीक नहीं है। 

   बैरक में पच्चीस साल का मनोज आराम फरमा रहा था। वैसे जज्बातों को भुलाकर नौकरी करना वह सीख चुका था पर फरवरी के महीने में न चाहते हुए भी यादों का एक झंझावात उठता कि वह बैचेन हो जाता। पुरानी बातें याद रखना हमेशा दर्द का कारण बनता है। पर पुराना काल ही खुद सामने आ जाये तो भला किसी का क्या वश है। भागने को भी जगह नहीं मिलती। 

   अभी दस दिन पहले राशन लेकर हैलीकोप्टर पहुंचा। लैफ्टिनेंट रुचि से अधिकांश फौजियों को बहन जैसा प्रेम था। रुचि भी उनका बहुत ध्यान रखती। 

  वैसे आर्मी के रूल के अनुसार रुचि अधिकारी थी और ज्यादातर फौजी उससे छोटे औहदे पर। पर भाई बहन के प्रेम के मध्य अक्सर औहदा नहीं रहता। केवल ड्यूटी करना अलग बात है। रुचि केवल ड्यूटी ही नहीं करती। वह अपने फौजी भाइयों पर प्रेम लुटाती। उसकी भी बङी विचित्र कहानी थी। पता नहीं उसमें क्या जिद थी कि वह एयरफोर्स में चली आयी। उसे और भी नौकरी मिल सकती थीं। जज्बे में कोई कमी नहीं थी। हैलीकोप्टर उङाना सीख लिया। अब अक्सर पहाङी छावनियों पर राशन वही पहुंचाती थी। अक्सर फौजी उसे अपने व्यक्तिगत कार्य भी बता देते। 

   " रुचि। मुझे इस सामान की जरूरत है। अगली बार लेती आना।" 

  " रुचि। बहुत दिनों से घर की खबर नहीं मिली। मेरे घर बात करके घर की खैरियत पूछ लेना।" 

  इधर पहाड़ी पर मोवाइल के सिग्नल तो थे नहीं। रुचि के पास सभी के घर के नम्बर थे। उनके हालचाल अक्सर रुचि ही पूछती और जब राशन देने आती तो उन्हें बता देती। अन्य जरूरत के सामान भी ला देती। फोजियो के परिवारजन रुचि को चिट्ठी भेजते, जिसे रुचि उन्हें पहुंचा देती। ये सब काम उसकी ड्यूटी में शामिल नहीं थे। फिर भी जिस प्रेम से वह इन्हें करती, कोई भी उसका कायल हो जाता। 

  पिछली बार रुचि के साथ एक नयी लङकी भी आयी। 

  " भाइयों। इनसे भी मिल लो। लैफ्टिनेंट सुचित्रा हैं। अब सेना ने मेरा भी काम आसान कर दिया है।" फिर रुचि हस दी। सारे फौजी सुचित्रा से मिले पर मनोज ने उससे दूरी बना ली। 

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  यादों की बारात में मनोज कुछ पांच साल पहले तक पहुंच गया। कालेज में कब उसका दिल सुचित्रा पर आया और उसे अपना बनाने की उमंग उसके मन में उठीं। पर यह मुमकिन न था। मनोज एक साधारण परिवार का लङका। उसके परिवार में उसके दादा, और माॅ ही थे। मनोज के दादा रिटायर्ड फौजी थे। और उसकी माॅ एक शहीद सैनिक की विधवा। मनोज को याद तो नहीं है। पर बताया जाता है कि जब उसके पिता का शव लाया गया था तो बहुत भीङ हुई। अनेकों बङे लोग उनके जनाजे में शरीफ हुए। नेताओं ने बङी बङी बातें कीं। अब यह मनोज के दादा जी का जोश था या कुछ और उन्होंने भी जनसमुदाय में घोषणा कर दी थीं कि उनका नाती भी फौज में जायेगा। 

   समय के साथ नेता अपना वायदा भूल गये। लोगों के मन से भी उनकी शहादत भूल चुकी थी। पर मनोज के दादा जी को आज तक अपनी बात याद थी। अपने वायदे को याद दिलाकर मनोज को तैयार किया जा रहा था। अपने बेटे को देश पर कुर्वान कर चुके दादाजी नाती को भी तैयार कर रहे थे। और इस काम में वह अकेले नहीं थे। मनोज की माॅ भी साथ थीं। तभी तो फौजी बनने का स्वप्न मनोज के मन में बस सा गया। 

  सुचित्रा बङी व्यवसायी की बेटी। उसके लिये दुनिया का कोई भी सुख दुर्लभ नहीं था। तो मनोज के मन की बात मन में ही रह गयी। 

  चौदह फरवरी का दिन था। 

  " एकाच्यूज भी। आप यहाँ अकेले क्यों बैठे हैं।" 

   हाथों में अनेकों गुलाब रखे सुचित्रा वहीं आ गयी जहाँ मनोज बैठा था। सुंदर और धनी लङकी को गुलाब भेंट करने बाले अनेकों लङके थे। शायद सुचित्रा किसी को नाराज नहीं करना चाहती थी। पर लगता है कि मनोज को इस तरह अकेला देख चली आयी। आखिर यह कौन है जिसपर उसकी रूप माधुरी का कोई असर नहीं। केवल इसी ने उसे न तो गुलाब दिया है और न कोई शुभकामनाएं। 

   मनोज की बेरुखी तो नहीं थी पर उसके मन में संकोच जरूर था। पर वही संकोच सुचित्रा को उसके पास ले आया।सामान्य मनोविज्ञान भी यही कहता है कि मनुष्य की ललक उसमें बढ जाती है जो दूर दिख रहा हो। वैसे कितने लङके सुचित्रा से दोस्ती करना चाहते पर सुचित्रा तो मनोज के करीब आना चाहती जो वास्तव में उससे दूर रहता। 

   धीरे धीरे दोनों एक दूसरे के बहुत करीब आ गये। दोनों को लगने लगा कि दोनों एक दूसरे के सपनों का हिस्सा हैं। पर यह स्थिति ज्यादा दिन नहीं रही। एक दिन मनोज ने सुचित्रा को अपने दादा जी का सपना बता दिया। बस वही दिन उनके प्रेम का आखरी दिन सिद्ध हुआ। 

  सुचित्रा के हिसाब से मनोज के भविष्य का निर्णय उसके दादा जी को करने का कोई अधिकार नहीं है। फिर यह सुचित्रा के जिंदगी की भी बात है। उसके पास क्या कमी है। एक फौजी का जीवन अनिश्चितता भरा होता है। फिर भी सुचित्रा ने मनोज को निर्णय लेने के लिये पर्याप्त समय दिया। 

   पर फिर मनोज ने सुचित्रा से कभी बात नहीं की। सुचित्रा उसका प्रेम थी। पर मनोज को अपने दादा जी के सपनों से भी प्रेम था। मनोज को अपनी माॅ के होसलों से प्रेम था। और शायद वंश परंपरा के अनुसार उसे देश से भी प्रेम था। सच्चा प्रेम हमेशा चाहत पर हावी रहता है। आज तक वैसे कई बार मनोज को सुचित्रा की याद आयी। शायद उसी लिये वह लगातार शादी करने से मना करता आया। पर उसे खुद के फैसले पर कभी कोई पछतावा नहीं हुआ। 

   दस दिनों से एक पत्र उसके पास रखा है। उसने अभी तक उस पत्र को देखा भी नहीं। पिछली बार उसे रुचि पत्र देकर गयी थी। आज फिर चौदह फरवरी थी। अनेकों बार मनोज ने पत्र उठाकर रख दिया। फिर अंत में पत्र खोलकर पढने लगा। 

  "

आदरणीय मनोज जी 

मेने कभी सोचा भी नहीं था कि आप मुझे इस तरह छोङ जायेंगें। अपनी सुंदरता और पिता जी के धन पर मेरा गुरूर कभी यह सोचने ही नहीं देता कि प्रेम कुछ अलग भी है। पर जब आपने मुझे छोङ दिया तब मुझे अहसास हुआ कि वास्तव में प्रेम केवल चाहत ही नहीं है। प्रेम वास्तव में बलिदान है। तभी तो आपने मुझे छोङकर इस प्रेम को चुना। 

   अलबत्ता। आपके परिवार का इतिहास मुझे पता चला। एक ऐसे गौरवशाली इतिहास के सदस्य के लिये वही उचित है जो आपने किया। 

  ऐसे ही बलिदान की इच्छा न जाने कब मन में आ गयी। फिर मेने भी एयरफोर्स जोइन कर ली। पिता जी ने रोका भी पर मैं नहीं मानी। 

  आपपर मैं कोई दबाव नहीं दूंगी। पर एकबार विचार करना। शायद अब मैं आपके जीवन का हिस्सा बन सकूं। फौजी का कुछ काल के जीवन से ही मुझे अहसास हो गया है कि एक फौजी का पहला और आखरी प्रेम केवल देश हो सकता है। मेरा भी अब प्रथम और अंतिम प्रेम देश ही है। फिर भी मेरे मन में आपके लिये आज भी कुछ जगह है। मेरा मन अभी भी मानता है कि आपके मन में भी देश प्रेम के अतिरिक्त कुछ जगह तो मेरे लिये भी है। 

   पिता जी ने आपसे दादा जी से हमारे विवाह की बात चलायी है। आपके उत्तर की मुझे प्रतीक्षा रहेगी। 

आपकी 
सुचित्रा। 

"

  क्या सुचित्रा का कहना सही है। शायद आज भी मनोज सुचित्रा को याद करता है। अगर नहीं तो क्यों हर वर्ष चौदह फरवरी को वह उदास हो जाता है। क्यों आज तक वह हर रिश्ते को ठुकराता रहा है। इसीलिये न कि उसके मन में आज भी सुचित्रा के लिये प्रेम है। 

  फिर हैलीकोप्टर की आवाज सुनाई दी। वैसे आज रुचि को नहीं आना था। पर शायद मौसम ठीक देख वह आज ही आ गयी है। 

   " यह लो भैय्या। आपके दादाजी की चिट्ठी आयी है। वैसे मेने पढ ली है। अब दादाजी से हाॅ कर देना। आखिर अब  वह भी तो चाहते हैं कि उनके पोते की शादी हो। फिर भाभी मेरी पसंद की है।" 

  आज रुचि खिलखिला कर हस दी। दूसरे फौजियों की भी हसी गूंजने लगी। इसी बीच मनोज अपने दादा जी को जबाब लिखने लगा। 

  " रुचि। मेरी चिट्ठी ले जाना। "

  मनोज ने भीतर से ही आवाज लगा दी। 

" अरे। अब मुझे फुर्सत नहीं है। दूसरे भाइयों की बात सुन रही हूं। ऐसा करो। सुचित्रा को भीतर भेज रही हूं। उसे ही चिट्ठी दे देना।" 

  फिर आज अनेक सालों बाद मनोज की नजरें सुचित्रा की नजरों से मिलीं। फिर दोनों ने ही शर्म के कारण नजरें फेर लीं। चिट्ठी में क्या लिखा है यह जानने की इच्छा सुचित्रा को थी। फिर वह कुछ देर खङी रही। मनोज ने चिट्ठी खोलकर सुचित्रा की तरफ बढा दी। 

" आदरणीय दादा जी 
सादर चरण स्पर्श 

  आपका पत्र मिला। आपकी बात कि एक फौजी लङकी मेरे लिये ठीक रहेगी, मुझे सही लग रही है। आपको मेने कभी बताया नहीं है। सुचित्रा मेरे साथ पढी है। 

   दादाजी। मैं अभी तक सारे रिश्तों के लिये मना कर रहा था। उसका भी एक कारण था। बचपन से ही आपकी और पिता जी की बहादुरी के किस्से सुनते आये मेरे मन में किसी के लिये प्रेम पनप गया। मुझे हमेशा से विश्वास था कि मेरा प्रेम मेरे विचारों के प्रतिकूल नहीं जा सकता। आज तक मैं इस दिन का इंतजार कर रहा था कि मैं आपको सर उठाकर बोल सकूं कि मेरे मन में जिसके लिये प्रेम उठा है, उसका भी पहला प्रेम हमारा देश ही है। 

   दादा जी। आज वह दिन आ चुका है। मेरी तरफ से सुचित्रा से विवाह प्रस्ताव की हाॅ है। 

   अवकाश मिलते ही जल्दी ही आपके और मम्मी के पास आऊंगा। 

   आपका मनोज 

"

  पत्र पढते ही सुचित्रा की नजरें शर्म से झुक गयीं। और वह पत्र उठाकर बाहर भाग कर रुचि के गले से लग गयी। 

समाप्त... 

रचनाकार : दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'