जब मैं छोटी थी मेरे पापा मुझे नई जूते दिलाने के लिए एक ही दुकान पर ले जाया करते थे, मुझे आज भी याद है उस दुकान का नाम रामू जूते वाला था ,और जब मुझे दिला कर लाते थे अपने लिए भी जरूर खरीदते थे,आज भी याद है उनके जूते का कलर डार्क ब्राउन था, मैं बार-बार कहती थी आप हर बार एक जैसे खरीद लेते हैं, मेरे पापा पैरों से कमजोर थे वह बताते थे कि बचपन में उन्हें पोलियो हो गया था ,लेकिन फिर भी सहारा लेकर चल लेते थे ,क्योंकि एक पैर उनका ठीक था धीरे धीरे बढ़ती उम्र के साथ उनके पैरों की शक्ति कमजोर होती चली गई, वह बैठकर चलने लगे  लेकिन दिल से बहुत ही स्ट्रांग थे ,उन्होंने हमें कभी महसूस भी नहीं होने दिया की वह पैरों से कमजोर है ,हमारी जरूरत की हर चीज अवेलेबल करके रखते थे ,बस फिर धीरे-धीरे जब मैं बड़ी होती चली गई पापा ने अपने जूते खरीदने बंद कर दिए, लेकिन मुझे जरूर दिलवा कर लाते थे, मैं मन ही मन यह सोचती थी कि पापा  अपने जूते नहीं लेते ये देख कर  मन दुखता था ,आज का विषय देखकर मुझे यह वाकया याद आ गया इंसान कितना लाचार हो जाता है इन बातों को देखकर मैं मन में एक बात  सोचती हूं कि यदि शरीर स्वस्थ होता है तभी हम जीवन के भौतिक सुखों का उपयोग कर सकते हैं नहीं तो यह पैसे रुपये यह फैसिलिटी सब बेकार है।


             संगीता वर्मा✍✍