प्यार भी थीं,लकिरों की हस्ती
कैसे पलि-बड़ी गरीबों की वस्ती
बाँध गई शेरों की वार
धरती चमकी,जगमग संसार.....



       रुपों में सब,डूब गई है
       इमानों को भी भूल गई है 
       सत्य-अहिंसा की हथियार
       धरती चमकी जगमग संसार..... 



वेष-भूषा पर जाति-पाति
जो भांजे,उसकी थीं लाठी
कैसे बदल गई फिर प्यार
धरती चमकी जगमग संसार.....



        प्राकृति में झूमें थीं लहरें
        इंसानों की यादें थीं शहरें
        बन गया कब्र मासूमों की हाल
        धरती चमकी जगमग संसार..... 



पीने को पानी तरस रहीं है
खाने की रोटी खिंसक रहीं है
फिर कैसे बना रहेगा प्यार
धरती चमकी जगमग संसार.....




        लेखक:-विकास कुमार लाभ
                       मधुबनी(बिहार)