एयर इंडिया की फ्लाइट दिल्ली जा रही थी । सभी स्वयं में व्यस्त थे। फिर एनाउंसमेंट नें ध्यान खींचा,
" आप सभी को बताना चाहता हूं कि यह मेरी मां की एक सफल पायलट के तौर पर आख़िरी फ्लाइट है और               को - पायलट के रूप में मेरी पहली फ्लाइट है , ये बहुत प्यारी मां हैं । " 

सभी पैसेंजर खुशी से ताली बजाने लगे । सब ने बधाई दी प्लेन सफलतापूर्वक धरती पर लैंड हो गया और इरा का सपना भी।

सपना वह जो  उसने बचपन में देखा था । अचानक से ......कैसे...?? वो यूं कि  एक दिन सुबह सवेरे खेत में  गड़ गड़ गड़  घरररर...भड़ाऽऽऽऽ म  करके हेलीकॉप्टर आ  गिरा। चारों ओर धुआं ही धुआं फैल चुका था। जानमाल की क्षति नहीं हुई फिर भी वहां उपस्थित लोग पायलट की बुराई करने लगे ,

" उड़ाना तो सही से आता नहीं " 

नन्ही ईरा झट‌ बोली इससे तो अच्छा मैं उड़ा लेती , बच्ची की बात सुनकर सभी के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई ।
अब तो बापू से रोज ज़िद होती ।  दादी डांटती और मां समझाती , 
"  ऐसे सपने बिटिया नहीं देखा करतीं " 

क्योंकि यह आज का नहीं 50 साल पुराना सपना है जब महिला पायलट जैसी कोई बात ही नहीं थी बल्कि पूरे गांव में भी शायद ही कोई पुरुष भी पायलट बना होगा । महिला पायलट का रेशियों  0.1 था जिसे पास किया सिर्फ ईरा ने।

बार-बार बापू को बताती मैं धरती हूं ! ! मास्टर साहब ने बताया है कि ईरा का अर्थ है ' धरती ' तो मेरे पास पूरी धरती की ताक़त है । वह भी खुश होते पास पैसा तो नहीं था  मगर कुछ ज़मीनें थी उन्हें बेचा और लोन लेकर रुपए का इंतजाम किया गया पढ़ाई के लिए।  23 वर्ष की आयु में पायलट बन कर एयर इंडिया ज्वाइन किया ।
एक स्त्री का जीवन  यही तो नहीं .....एक  दिन उसकी मुलाकात हुई कैप्टन शर्मा से , दोस्ती आगे बढ़ी  अब वो ईरा शर्मा बन गई।  विदाई के समय ही मां ने समझा दिया था,

" बेटा परिवार ही हमारी जमा पूंजी है । परिवार का सुख   सबसे बड़ा होता है। ध्यान रखना..."

उसने भी मां की बात गांठ बांध ली । ससुराल में भरा पूरा परिवार था । सबको जानने के लिए साथ समय बिताना होगा इसलिए सबसे पहले तो एक  महीने की छुट्टी ली जो आसानी से नहीं मिली फिर भी मिल गई । इस समय में उसने घर वालों को समझा बूझा । पूरा प्रयास किया कि किसी भी प्रकार से समाज में प्रचलित नौकरी पेशा होने का कोई टैग उसपर ना लग जाए ।

घर के अन्य सदस्य भी समझदार थे । सासू मां जो थोड़ी पढ़ी लिखी थी  । वो भी हर कार्य में उसकी मदद कर रही थी लेकिन कभी-कभी बात ही बातों में बताती, 

"  बेटा औरतों का‌ नौकरी करना आसान काम नहीं है। आज तुम संभाल लोगी कल को बच्चे होंगे तुम्हारी ज़िम्मेदारी बढ़ेगी"

या फिर पड़ोस में रहने वाली सासु मां की बहन भी अनुभव की बातें बताती  रहती है । ईरा सिर्फ जी  हां .....करके रह जाती । 

बात तो उनकी भी सच ही थी लेकिन अपने दिल को कैसे समझाए । औरत का भी तो सपनों पर हक है । घर औरत का  संसार है तो क्या छोटी खिड़की से वह झांक भी नहीं सकती।

कैप्टन शर्मा !  वह प्यार से उन्हें कैप्टन ही कहती , तो सदैव ही कैप्टन जी का प्रोत्साहन उसके सपनों की सीढ़ी बन जाता । छुट्टियां समाप्त हो गई , अब आसमान  उसका इंतजार कर रहा था । दोहरी चुनौतियां समक्ष थी । मांग सिर्फ कठिन परिश्रम की ही थी कुछ पाना है तो बिना मेहनत के मिल नहीं सकता ।

सहकर्मी भी उससे  सवाल करते, 
"  विवाह की बधाइयां ईरा !... पर तुम यह मैनेज कैसे कर रही हो टिप्स तो दो  ना " 

वह हंस के टाल जाती है अभी तो शुरुआत है । एक वर्ष खुशी-खुशी सहयोग से गुजर गए । दूसरे वर्ष के साथ आगमन हुआ नन्हे ' आदीप '  का । ईरा संयुक्त परिवार का महत्व जानती थी पता था कि उसके बच्चे की परवरिश में साथ रहकर ही  कोई समस्या नहीं  होगी । आदीप कभी दादा-दादी कभी चाचू - बुआ के हाथों में खेलता रहता लेकिन मां की जगह कोई नहीं ले सकता ।

अक्सर देखती की माजी भी कुछ परेशान हैं वह भी धीरे-धीरे वृद्धावस्था की तरफ जा रही हैं तो  बच्चे को भागदौड़ कर हर समय पकड़ नहीं सकती इसी कारण ईरा की दोस्त ने क्रच  में डालने का सुझाव दिया । उसे सुझाव पसंद आया कामकाजी महिलाओं के लिए एक बड़ा सहारा है।

अचानक से मांजी नाराज हो गईं, पास बैठी उनकी बड़ी बहन तो हत्थे से ही उखड़ गईं ,
"  बेटा यह तो पाश्चात्य सभ्यता के चोंचले हैं इससे बच्चों पर भी बुरा असर पड़ता है  । मैं भी अपने समय की पढ़ी-लिखी हूं चाहती तो कहीं टीचर बन सकती लेकिन घर और बच्चों को तब मैं सही से समय ना दे पाती इस कारण मैंने अपने सपने को छोड़ दिया । " सासू मां थोड़े धीरे होकर समझाने लगी जब ईरा का उतरा चेहरा देखा तो।

" हां तो और क्या औरत को ही समझना होगा हमने भी यही किया आजकल सबने बहुत क्रच  का नाम लेना शुरू कर दिया है । अपनी आज़ादी पाने का बहाना है । मेरी बात सुन लो बच्चे पलेंगे क्रच में तो बूढ़े भी जाएंगे वृद्धा आश्रम में तैयार हो जाओ सब लोग " 

उनकी बहन ने काफी तेजी से बोला तो सासु मां ने उनका हाथ पकड़ लिया । ईरा को तो काटो खून नहीं वह चली थी भलाई करने या फिर कहें तो अपने लिए सहारा ढूंढने पर ऐसी चोट पड़ेगी सोचा नहीं था ।

कमरे में बैठी रो रही थी कि कैप्टन शर्मा भी ड्यूटी पूरी कर के आए तो उतरा चेहरा देख सवाल कर बैठे , 
" मेरी परी क्यों उदास है..? "  प्यार से परी  कहते आसमान में उड़ने वाली तो परी ही होती है ।

सोच रही हूं कि अपने पंख काट दूं यह ना होंगे तो उड़ने की इच्छा भी ना होगी । उन्होंने पूरी बात उगलवा ही ली । लगाई बुझाई करना उसे पसंद नहीं था लेकिन समाधान तो ढूंढना ही था  । 
कैप्टन शर्मा बड़े आराम से बोले 

" क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात "  

क्या मतलब ? ईरा चौंकी।

" अरे ! समझो ना जैसे कि श्लोक है छोटे तो शैतानी करते ही हैं बड़ों को उन्हें क्षमा करना चाहिए उसी तरह तुम अगर बड़ा मुक़ा‌म हासिल करना चाहती हो तो तो  अपना दिल बड़ा करना पड़ेगा । छोटी-छोटी बातों पर ध्यान ना दो । सही फैसला करो मैं तुम्हारे साथ हूं ।" 

अच्छा.... कह कर वह सोचों मैं घिर गई ।

फिर उसने दूसरा हल निकाला छोटी दूरी की छोटी-छोटी फ्लाइट लेनी शुरू कर दी ताकि अधिक समय तक घर से बाहर ना रहे । कुछ दिनों में नंद की शादी धूमधाम से हुई। देवर नौकरी पर कनाडा चला गया अब घर में बचे सास-ससुर।

पांच वर्ष बाद दोबारा से नन्हा ' युवान'  उसके पास था । इस बार उसने बिना किसी से पूछे उसे क्रच  में डाल दिया थोड़े दिनों के लिए । मगर पूरी सजगता और सतर्कता के साथ ।

सासू मां भी इतने दिनों में समझ गईं थी कि ईरा  घर गृहस्ती वाली समझदार लड़की है।  उन्होंने कोई विरोध नहीं किया , उनकी भी अब हिम्मत नहीं कि छोटा बच्चा संभाल पाएं।

समय आगे बढ़ता गया सास - ससुर का साथ छूट गया अंतिम समय में उनकी सेवा की । साथ में नौकरानी लगाई उसकी भी निगरानी की । 
इस बात का सुकून है कि उसने बच्चों को सदैव समय दिया स्कूल की एक भी पैरंट - टीचर मीटिंग मिस नहीं की । बीमारी पर ध्यान दिया और हां घर में स्वयं के लिए और बच्चों के लिए कड़े अनुशासन नियम बनाए । इसके बिना कुछ भी संभव नहीं था ।

उसे  पता था कि उसके  बच्चे उसे  वृद्धा आश्रम में नहीं डालेंगे क्योंकि उसने अपने परिवार को प्रेम की डोर से बांध रखा है । बच्चे धीरे-धीरे बड़े हो गए ,  वह लंबी दूरी की फ्लाइट भी लेने लगी और आज वो रिटायर हो गई ।

रिटायरमेंट समारोह से लौट अपने कमरे में आकर लेट गई। टेबल पर रखी अपने परिवार की ग्रुप फोटो उठाकर देखने लगी मन में सुकून ही सुकून था ।

मोबाइल उठाया , ट्विटर पर एक लेडी पायलट ट्वीट शेयर कर रही थी , 
" आज एक हरियाणवी दादी कोकपिट का नज़ारा देखने आई तो लेडी पायलट को देख कर बोली,  अरे ..!  यहां तो छोरी बैठी से "  सब उसके ट्वीट को लाइक कर रहे थे । ईरा भी मुस्कुराने लगी ।

हां... छोरी सब जगह स्थान बना सकती है परिवार के साथ भी।


                 राबिया शमीम
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