नहर,तटिनी में बहकर
करती हो उपकार हम सब प्रजा जन पर
सींचती हो फसलों को जीवन दायिनी गंगोत्री बनकर
इसलिए हे मोक्षदायिनी गंगे बनारस विभिन्न घाटों पर
श्रद्धापूरित होकर नीररूप को करते हैं सब शत शत नमन।
कभी बर्फ बन कर सब को लुभाती हो
कभी वाष्पीकरण होकर हाहाकार मचाती हो
कभी जल बनकर प्यासे की प्यास बुझाती हो
लोग तुम्हें जिस रूप में भी ढालते ढल जाती हो
वा रि, वारि तुम कितनी सहज ,कितनी उदार ,हो
मानव जीवन का उद्धार करने के लिए तत्पर रहती हो।
बारिश की बूंदे बन तन,मन,जन को हर्षती हो
धरती को जलमग्न करने सावन में तुम आती हो
रौद्र रूप धर कर अपना बेहद आक्रोश जताती हो
सबका जीवनं अस्त व्यस्त कर बाढ़ का रूप कहलाती हो।
कभी खुशियों में और गमों में
अंखियों से अश्रु धार बनकर
आप: बहती हो दोनों रूपों में
मनसा जाहिर करती सब लोगों को तुम।
उपयोगी रूप अनेक तुम्हारे
बिन पानी सब सून कह गए रहिमन हमारे
दूषित, काला गंदा होकर मृत जल कहलाती हो
जैसी संगति वैसा ही का पर्याय तुम बन जाती हो
पानी पानी रे कितने रूप तुम्हारे हर पात्र में ढल जाती हो।
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राजेश्वरी ठाकुर

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