इन बूढ़ी आंखों में
एक इंतजार ठहरा है
आओगे तुम एक रोज जरूर
बस ये विश्वास ठहरा है।
भरी थी उड़ान जब सपनों ने
तब ये आंखें इतनी बूढ़ी न थीं
था अटूट विश्वास इन हाथों को
परवरिश इनकी कच्ची न थी।
ज्यों- ज्यों समय बढ़ता गया
ये विश्वास दरकता गया
टकटकी लगाये बस दरवाजे को
एकटक यूँ ही देखता गया।
हुआ मशगूल तू अपनी दुनिया में
अपने माँ- बाप को ही भूलता गया
दुनिया की झूठी चमक-दमक में
तू इनका प्यार भूलता गया।
अब आस बस इतनी सी है
जी भरकर तुझे निहार लूँ
जीवन डोर टूटने से पहले
जी भरकर तुझे दुलार लूँ।
मुझे पता है मेरे जाने के बाद
तू इस प्यार- ममता को तरसेगा
लाख चाहें इसे भुलाना
मन तेरा इसे पाने को भटकेगा।
सबकी इच्छा पूरी करने के बाद भी
अपने मन को अतृप्त पायेगा
तब तुझे इन बूढ़ी आंखों का
मजबूर,लाचार और बेबस सा
मात-पिता का प्यार नजर आएगा।।
आशा झा सखी

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