समुद्र का किनारा देखने को बहुत इच्छुक था मन।
जगन्नाथ दर्शन को पूरी पहुँच गया ये तन।
पहले किये प्रभु के साक्षात् दर्शन ।
फिर समुद्र के किनारे पहुँच गए हम स्वजन ।
पहलम पहल देखकर गगनचुम्बी लहरे ।
कुछ सहमे कुछ अचंभित हुए हमारे चहरे ।
तभी पैरों ने उस गीली रेत को छुआ ।
ऐसे लगा जैसे कि कोई जादू हुआ ।
हठीली रेत पैरों से फिसलती जा रही थी।
मानों लगा लहरे मुझे बुला रही थी ।
कहती मुझको पकडो और दूर चली जाती ।
कभी पास आकर पैरों से लिपट जाती ।
क्षितिज तक ऑखे उसको ताकॅती।
ऑखों से गहराई उसकी नापती।
लगता बाहों में सारा समुद्र भर लूंगी मै।
कभी उसकी लहरों मे उलझ जाती ।
थोड़ी देर में मै गयी सहर।
तन मन हो गया भाव विभोर ।
समुद्र का वो किनारा आज भी हम को है याद ।
ये सागर से मिलने का पहला अदभुत एहसास ।
नीलम गुप्ता🌹🌹( नजरिया )🌹🌹

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