शकुन्तले ,,के प्रिये सखे ,,खरगोश 
तुमने क्यो नही समझाया दुष्यंत को 
जब बिसरा बैठे तेरी सखी शकुन्तले को 
कितना लाड तुझे करती थी ,दाना चुगाती थी ।

कैसी मित्रता निभायी शकुन्तले से तूने बता 
बडा फुदकता फिरता रहता था उनके पीछे 
दिखा देता जाकर बह सरोवर दुष्यंत को तू 
जहाँ विलुप्त मुद्रिका मीन के उदर गयी थी ।

कुछ तो कर देता शकुन के लिये तू खरगोश 
कैसे गोदी मे तुझे लेकर स्नेह धार बरसाती थी 
तनिक भी दया नही आयी तुझे आँसुओ को देख 
विरह वेदना का कष्ट क्या होता तू क्या जाने मित्र।

शकुन्तला का जीवन ,दुर्वासा का शाप का फल 
किन्तु,,तू भी कोई कम ना था मौन देखता रहा सब 
अगाध स्नेह उपवन से करती थी ये उपकार किया 
प्रेम विरह मे शकुन्तला को अकेला छोड दिया ...



                मीनाक्षी शर्मा