पहाड़ो के आँचल से  जो जमी से मिल जाते हैं
कल कल करते झरने जब  धरा पर बलखाते हैं।

किसी प्रिय की नजरों में बसी प्रिया की तरह
कुछ शरमाते कुछ इतराते चंचल नजर आते हैं।

जब इधर उधर वेग से बिखरती हैं उसकी लहरें,
लगता है प्रिय के केश व्यार में उड़े जाते हैं।

जब पारदर्शी स्वच्छ जल कण दिखते हैं,
ऐसा लगता है प्रिय के नयन भरमाते हैं।

जब दूर दूर तक लहरें  निकलती हैं ,
ऐसा लगता है प्रिय तेरी साड़ी के छोर फहराते हैं।

जब कहीं उठती हैं तरंगे झरने से,
ऐसा लगता है मन के एहसास मचल जाते हैं।

जब कभी छिन्नभिन्न सा पानी गिरता है,
लगता है प्रिय के होंठ खिलखिलाते हैं।

देखकर वो सोंधी सोंधी सी सुगन्ध इनकी,
बड़े बड़े ध्यानियों के ध्यान भटक जाते हैं।

अजब सा दीवानापन है इनकी रवानी में,
  देखकर इनको पत्थरों के जज्बात भी बह जाते हैं।

कहाँ माँगते है अपने लिए कुछ किसी से,
जहाँ भी जाते हैं सबकी प्यास बुझाते हैं।





                     अंजू दीक्षित,
                   बदायूँ,उत्तर प्रदेश।