उड़ने लगी हूं आजाद गगन में
लेकर अपना अस्तित्व
भूलकर सारे बंधनों को
सिर्फ ,
स्त्रीत्व की परिभाषा गढ़ने को ।
चूल्हे का धुआं ही नहीं हूं
ना सब्जी का स्वाद केवल
ना रोटी की गोलाई का माप हूं
ना ही नमक का अंदाज केवल
महारत इनमें भी हासिल है
पर मानती नहीं हूं,क्या
सिर्फ यही परिचायक है
स्त्रीत्व की परिभाषा गढ़ने को।।
दुख सुख सबके बांट लिए
हाथों में मेहंदी रची रही
राहों के कांटे भूल गई
जब पैरों में पायल छनक उठी
हाथों के कंगन को सुख समझा अपना
दिल के दर्द छुपाती रही ,
सिर्फ,
स्त्रीत्व की परिभाषा गढ़ने को।।
कठपुतली सबकी बनी रही
आशाओं से घिरी रही
मीठी झूठी मुस्कानों से जाने कितना छली गई,
मौन रही दिल की खुशियां
सिर्फ,
स्त्रीत्व की परिभाषा गढ़ने को।।
तोड़ रही हूं सीमाएं
मस्त मगन अब जीती हूं
मर्यादाओं में रहकर भी
स्वाभिमान का अमृत पीती हूं
अपनी खुशियों को पंख लगा
ऊंची उड़ान भरती हूं
अपनी मंज़िल ढूंढ रही हूं
अपना अस्तित्व बनने को
सिर्फ
स्त्रीत्व की नई परिभाषा गढ़ने को ।।
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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