सृष्टि ने घर के अंदर कदम रखा तो पापा को हॉल में बेचैनी से घूमते हुए पाया । सृष्टि को देखकर वह एकदम उसके पास आए ।
हर्षवर्धन : तुम्हें कहीं चोट तो नहीं आई, ? कितनी बार कहा है पर सुनती नहीं हो । तुम्हें कुछ हो गया तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा ।
सृष्टि : पापा, पापा, मैं बिल्कुल ठीक हूं । पता नहीं कैसे गाड़ी के ब्रेक फेल हो गए । अभी तो नई गाड़ी है और कल शाम को भी तो मैंने गाड़ी चलाई थी, तब तो बिल्कुल ठीक
थी ।
हर्षवर्धन : बेटी, ये तुम्हारे साथ साल में दो - तीन बार ऐसी
कोई न कोई घटना हो जाती है । मैं आज ही कमिश्नर से बात
करता हूं, इसके पीछे कोई षडयंत्र तो नहीं ।
सृष्टि : अरे पापा, ऐसा कुछ नहीं है । इट वाज एन
एक्सिडेंट । आप परेशान न हो । पापा, मैं बहुत थक गई हूं ।
अपने कमरे में जा रही हूं । आपसे फिर मिलूंगी ।
हर्षवर्धन के माथे पर चिंता की लकीरें थी । उन्हें किसी साजिश की बू आ रही थी । अभी हर्षवर्धन अपनी सोच में
डूबे हुए थे कि उसका छोटा भाई यशवर्धन हॉल में आया ।
यश : क्या हुआ भैया ? किस सोच में डूबे हो ? मेरे आने का भी आपको पता नहीं चला ।
हर्षवर्धन : यश, मुझे कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है ।
सृष्टि के साथ बार-बार इस तरह के एक्सीडेंट मुझे नॉर्मल बात नहीं लगती ।
यश : अब क्या हुआ भैया, सृष्टि ठीक तो है न ? वह बाहर से अभी तक नहीं आई क्या ? बोलो भैया, कोई चिंता की बात है क्या ?
हर्षवर्धन : आज सृष्टि की गाड़ी के ब्रेक फेल हो गए थे ।
अभी कुछ दिन पहले भी जब वह स्विमिंग पूल में थी तो न जाने कहां से एक सांप उसके पास आ गया था । उससे पहले
जब वह अपनी सहेलियों के साथ शिमला गई थी तो पहाड़ी पर से गिरते-गिरते बची थी । अभी कुछ समय से बार-बार इसके साथ ऐसी घटनाएं हो रही हैं । मुझे लगता है हमें इसकी सुरक्षा के लिए बॉडीगार्ड लगा देने चाहिए ।
यश : हां भैया, आप ठीक कहते हैं । हमें देर नहीं करनी चाहिए । मैं आज ही कमिश्नर से अपोइंटमेंट फिक्स करता
हूं । सृष्टि बेटी के लिए हम जो भी कर सकते हैं, करेंगे ।
तभी यशवर्धन का बेटा हिमांशु हॉल में आया ।वह पीये हुए
था और लड़खड़ा रहा था । सामने अपने ताऊ जी को देखकर वापस जाने लगा । यश ने आवाज लगाई और रुकने के लिए कहा ।
यश : आज फिर से पी कर आए हो, कितनी बार समझाया इतना मत पिया करो कि ठीक से चल भी ना सको । तुम्हें शर्म नहीं आती भाई साहब के सामने ऐसी हालत में आते हुए ।
तुमने मुझे मुंह दिखाने लायक नहीं रखा । क्यों करते हो ऐसा ? क्यों मेरा सिर झुकाते हो ?
हिमांशु अपने ताऊजी से नजरे चुराते हुए, लड़खड़ाती जबान में बोला ।
हिमांशु : इसलिए तो चुपचाप वापस जा रहा था, आप ही ने रोका । मेरा गम आप नहीं समझोगे । मैं जाता हूं, आप लगे रहो । क्या कर रहे थे, करते रहो,करते रहो । मै जाता हूं ।
हर्षवर्धन हिमांशु को रोकना चाहता था, बात करना चाहता था पर एक तो उसकी यह हालत है, उसपर सृष्टि की चिंता इसलिए हिमांशु को जाने दिया ।
यश के जाने के बाद हर्षवर्धन सोचने लगा । उसने कितनी मुश्किल से आज यह मुकाम हासिल किया है । यह सब सृष्टि का ही है । सृष्टि को पालने में मैंने कोई कसर ना रखी । उसे
दुनिया के सारे एशोआराम देने के लिए, मैंने सही - गलत सारे
रास्ते अपनाए । पर अब बार - बार मेरी सृष्टि के साथ इस तरह की घटनाएं क्यों हो रही है ? जब से सृष्टि की मां इस दुनिया से गई है, मैं शायद सृष्टि की देखभाल ठीक से नहीं कर पा रहा हूं । मुझे कुछ करना होगा । यह सोचते - सोचते
हर्षवर्धन ने आंखें बंद कर सिर सोफे पर टिका दिया ।
क्रमशः
धनु दयाल

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