धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर आने लगी ।
संतोष का भी स्कूल में दाखिला करा दिया गया । संतोष पढ़ने में होशियार तो थी ही । अब तो वह और ज्यादा मन लगाकर पढ़ने लगी । उसने कराटे सीखना भी शुरू कर दिया । स्नातक में उसने मनोविज्ञान विषय चुना । धीरे-धीरे वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने लगी । संतोष और देविका बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाती थी । राजू सब की देखभाल में कोई कसर नहीं रखता । सुधा भी देविका और संतोष को परिवार के सदस्य की तरह स्नेह करती ।
समय अनवरत चलता रहा ।
अब वे झोपड़ी से निकलकर नए घर में रहने आ गए ।
संतोष ने स्नातक में प्रथम स्थान प्राप्त किया । वह कराटे की मास्टर बन गई और उसी जगह पर ही दूसरे बच्चों को भी सिखाने लगी । वह स्कूलों में जाकर कक्षाएं लेती जिसमें लड़कियों को मानसिक और शारीरिक रूप से सबल बनने के लिए प्रेरित करती । संतोष विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में महिलाओं के संबंध में लेख भी लिखती । संतोष का नाम और काम समाचार पत्रों में छपने लगा ।
महिला दिवस पर संतोष को साकार महिला विकास समिति की ओर से अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मान समारोह के आयोजन में मुख्य अतिथि के रुप में आमंत्रित किया गया । संतोष अपने परिवार के साथ वहां पहुंची ।
आत्मविश्वास से लबरेज संतोष जब स्टेज पर पहुंची तालियों की गड़गड़ाहट से उसका स्वागत हुआ । देविका ने चारों ओर नजर दौड़ाई, खुशी से उसकी आंखें भर आई । आज उसकी मेहनत सफल हो गई थी ।
संतोष ने सभी को नमस्कार कर कहा, "महिला दिवस, सिर्फ एक दिन मनाने का दिवस नहीं है । यह विचारों और सोच में बस जाना चाहिए । क्यों जरूरत पड़ती है हमें महिला दिवस मनाने की ? हमें ऐसा समाज चाहिए जहां स्त्री, पुरुष के समकक्ष खड़ी होकर आंख से आंख मिला सके । पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के पूरक हैं । फिर हर बात के लिए स्त्री को ही दोषी क्यों मान लिया जाता है । अगर पुरुष नायक है तो स्त्री नायिका । कोई किसी से कमतर नहीं । मैं आज इस सम्मान की अधिकारी बनी तो सिर्फ अपनी मां की वजह
से । मेरी नजर में वह मेरी नायिका है, मेरी प्रेरणा है । लेकिन मेरे पिता नायक नहीं थे । इसका मतलब यह नहीं कि मैं पुरुषों के विरुद्ध हो गई क्योंकि कोई भी संपूर्ण नहीं है । सभी को साथ और सहारे की जरूरत होती है । मेरे जीवन में राजू मामा और मामी मेरे नायक और नायिका हैं । जो हमेशा मेरे साथ खड़े रहे । शशांक मेरे नायक है जो मेरे अच्छे मित्र हैं और मेरे जीवन साथी भी बनने वाले हैं । मेरा छोटा भाई माधव जिसकी वजह से मेरे चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है । मैं बस सभी से एक बात कहना चाहूंगी, कभी अपनी बेड़ियों से प्यार ना करें । उन बेड़ियों को जाने, समझे और पूरा बल लगा दीजिए आजाद होने के लिए । सबसे पहले अपनी नजरों में खुद अपनी नायिका बने ।"
संतोष की आवाज पूरे हॉल में गूंज रही थी ।
संतोष ने देविका को स्टेज पर बुलाया और देविका को अपना सम्मान पत्र दिया । एक बार फिर हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा ।
संतोष अपने परिवार के साथ हॉल से बाहर निकल अपनी गाड़ी की ओर बढ़ी । देविका की नजर एक व्यक्ति पर गई जो एक ओट में छिपने की कोशिश कर रहा था । देविका उसकी ओर बढ़ गई । सभी देविका के पीछे चल दिए ।
देविका के सामने रोशन खड़ा था । रोशन हाथ जोड़े देविका को आंसू भरी नजरों से देख रहा था ।
देविका ने हैरानी से कहा, "आप यहां ?"
रोशन भर्राए गले से बोला, "देविका मुझे माफ कर दो । संतोष से तो मैं माफी मांगने लायक भी नहीं हूं ।"
संतोष भी रोशन को पहचान गई थी । वह आगे आकर बोली, "माफी मांगने की जरूरत नहीं है । आप मेरे बापू हो लेकिन मेरे नाम के साथ आपका नहीं मां का नाम रहेगा । मुझे आपको और कुछ नहीं कहना ।"
देविका ने अपने को संभालते हुए कहा, "आप यहां कैसे आए ?"
रोशन बोला, "मुझे समाचार पत्र से यहां के बारे में पता
चला । जिसमें संतोष के फोटो और नाम के साथ तुम्हारा नाम लिखा था । "
रोशन अपने आंसुओं को पौंछते हुए बोला, "देविका जब तुम चली गई, मैंने दूसरी शादी कर ली । मुझे उससे कोई संतान नहीं मिली । समय के साथ तुम्हारा व्यवहार, तुम्हारी अच्छाइयां मेरे सामने आने लगी । मैंने तुम दोनों के साथ जो किया वह गलत था । कभी भी तुम्हारा कोई दोष नहीं था । मैं पश्चाताप की अग्नि में जल रहा हूं । मैं बस तुम दोनों से माफी मांगना चाहता था ।"
देविका ने रोशन की आंखों में देखते हुए कहा, "रोशन वापस लौट जाओ । जो तुम्हारे पास है उसी में खुशी ढूंढो । अपनी पत्नी को प्यार के साथ-साथ सम्मान भी देना । उसी से तुम्हें सुकून मिलेगा ।"
यह कहकर देविका ने संतोष का हाथ पकड़ा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गई ।
धनु दयाल
समाप्त

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