जंगल है पर,आराम नहीं है,
     कैसा भाग्य बना है.....
ना बच्चे,सही सलामत,
     'चित-चैन' उड़ी रहती है.....

उड़ी आकाश तो मन हर्षाये,
      मस्ती में मीठी,गीत सुनाये.....
साथ चूगती दाना,गस्ती में,
      पंखी फरफराते,फिर उड़ जाती.....

सुंदर 'आकर्षण' से शरीर बनी है,
      प्यार की गहरी रंग छिड़ी है.....
'जंगल' अब उज़र रही है,
      कौन जाने मेरी,दर्द की बोली.....


        लेखक:-विकास कुमार लाभ
                       मधुबनी(बिहार)