मुँह अंधेरे उठने वाली,
आज लगी आँख जरा,
प्रात: का सूरज चढ़ आया,
चहुँ ओर उजियारा छाया,
हाथों को अपने करके ऊपर,
ज्यों देखा भित्ति की ओर,
उकर गया था चित्र,
जिसे देख मन मुस्काया,
ये कैसा रुप उभर कर आया,
भित्ती पर था मेरे हाथों का प्रतिबिम्ब,
थी वो हाथों की अपनी ही प्रतिछाया,
सरपट दोड़ा मन बचपन मैं,
साथ खड़ा दादी का साया,
मुझे दिखाती मुझे सिखाती,
खोलें अपनी कहानियों का पिटारा,
कभी हाथों से खरगोश बनातीं,
कभी आसमा में पंछी उड़ाती,
बत्ती होती जब गुल,
कहते बच्चे अब,
दादी ऽऽदादी बनाओ चित्र,
भित्ती पर हुयी कलाकारी दादी की,
बनते चित्र भित्ती पर,
हाथों की कलाकारी,
मेरी दादी ने मुझे सिखाया,
घुमाघुमा कर हाथों को आड़े तिरछे,
बन रहे चित्र भित्ती पर,
ये देखो बन गया खरगोश प्यारा,
खा रहा देखो कैसे,
पत्ती का टुकड़ा मुँह में डाले,
अब देखो बन गयी बकरी प्यारी,
अरेऽऽ देखो देखो प्यारे बच्चों,
बकरी भी मुँह चबा रही,
दादी दादी ये ऽऽदेखो ,
बनायी मैंने मछली प्यारी,
मछली जल की रानी है,
हाथ लगाओ डर जाती,
बाहर निकालो मर जाती,
पानी में डालो जी जाती ऽऽ
दादी पानी में डाल कर आऊँ इसको,
ये तो बत्तख आ गयी बिन पानी के,
कैसी चढ़ रही भित्ती ऊपर,
हा हा हा हा हा,
ओ ऽऽऽ ओ ऽऽऽ हो,
दादी ऽऽलाईट आ गयी,
गुल हो गये,
भित्ती के चित्र सारे ।
काव्य रचना -रजनी कटारे
जबलपुर (म. प्र.)

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