प्रतीकों में फंसा मन
ढूँढता था प्रतीकों को
उठी तब ही
यह
चंचल नजर
जा पहुँची उसके आँचल पर
टँके थे जिसमें तारे
लगते थे जो प्यारे
मगर
देखा निकट जाकर
उसके
वो
तारे नहीं फूल थे
खिलते थे जो
खिलाये बिन भँवरे के
मगर
वे फूल भी फूल नहीं थे
था मेरी नजर का भ्रम
फिर
नजर पहुँची मेरी पुष्प के पराग पर
था
वहाँ एक भँवरा
मगर
वह भँवरा भी भँवरा नहीं था
वहाँ थी मात्र कालिख
लगी थी जो उस आँचल पर
मगर
असलियत में वह
आँचल भी आँचल नहीं था
जाली थी काँटों की
जिसमें
रह गई
मेरी नजर फँस कर
एक
असहाय पंक्षी की तरह।
देवयानी भारद्वाज

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