समय गुजरता गया
पर
गुजरते समय के साथ ,
मेरा वह प्रश्न कि
"क्या मैं गलत हूँ?"
नहीं गुजरा|
वह प्रश्न, आज भी,
एक महान स्वाभिमानी की तरह ,मेरे हृदय के द्वार पर उन्नत भाल लिए खड़ा है,
एक सत्य की आस में|
मगर
संसार में पग- पग पर
मिलते सम्मान को देख
मन कह उठता,
"नहीं,
नहीं ,मैं गलत नहीं हूँ|"
परन्तु वह प्रश्न बार- बार
किसी जिन्न के समान मेरे सामने आ जाता
और
चैन छीनने को तत्पर दिखता|
मैंने भी ,
उत्तर की तलाश में,
कोई कोर कसर नहीं छोड़ी,
दुनियाँ से जानना चाहा,
उसने भी ठकुरसुहाती रीति को अपना लिया,
आईना भी अपने धर्म से विमुख रहा,
मगर मैं प्रश्न का उत्तर पाने को लालायित थी,
मेरा मन भी कोई निर्णय नहीं दे पा रहा था,
परन्तु आज
मौत से मेरा सामना हुआ|
मैंने उस पर भी
वही पुराना घिसा-पिटा प्रश्न दाग दिया,
"क्या मैं गलत हूँ?"
मौत ने बड़े ही अदब से कहा ,
"मैं क्या कहूँ?
स्वयं ही देख लीजिए न|"
बातों ही बातों में,
उसने अपनी आँखें
मेरी आँखों में डाल दीं,
फिर क्या था
सारी गुत्थियाँ
परत दरपरत खुलने लगीं|
उफ !
जिन झील सी आँखों से
हरदम ममता टपकती दिखती थी,
वहाँ ममता के पर्दे में
नफरत के अलावा कुछ नहीं था|
मेरी आत्मा चीख-चीख कर कह रही थी कि
"तूने तो प्यार ,स्नेह जैसे शब्दों का
मतलब ही नहीं जाना|
तू कैसे किसी पर करुणा लुटा सकती है ?
तूने तो हमेशा
सिर्फ और सिर्फ
स्वयं से प्यार किया है|"
ओह!
जिस सागर से हृदय में
प्रेम, स्नेह, करुणा जैसे बहुमूल्य रत्नों की कल्पना की जा रही थी,
वहाँ कटुता के नुकीले पत्थर,
मधु टपकाती जिह्वा पर
अनगिनत काँटे,
अपने ही सौम्य चेहरे पर आज ,
जब मैंने
दुष्टता और मक्कारी का जीता जागता
हैवानी नजारा देखा,
साँसें तीव्रतर हो रहीं थीं,
दिल घबरा रहा था,
हलक सूखा जा रहा था,
प्राण शरीर से नाता छोड़ना ही चाहते थे कि
हड़बड़ाहट में मेरी नींद टूट गई,
मेरा शरीर
थर थर काँपता हुआ
पसीना- पसीना हो रहा था,
आँसुओं की झड़ी लगीं थीं|
क्यों ?
मौत के डर से?
नहीं ,नहीं,
आज मैंने
अपने असली चेहरे की रंगत जो देखी थी,
कितना घिनौना !
छि छि !
काश! हम
उस मौत का अहसास हर पल कर पाते,
और बन पाते एक इंसान,
एक मानव,
हैवानियत को मार ।
देवयानी भारद्वाज

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